सरहद से सेब के बाग तक: कर्नल दिव्या ठाकुर ने छिड़ा 'शुद्ध जैविक' मिशन
हिमाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों और शांत ढलानों के बीच एक मौन क्रांति आकार ले रही है। इस बदलाव की कमान किसी पारंपरिक किसान ने नहीं, बल्कि भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त जांबाज, कर्नल दिव्या ठाकुर ने संभाली है। 37 वर्षों तक देश की सीमाओं की रक्षा करने के बाद, कर्नल ठाकुर अब 'मिट्टी की शुद्धता' और 'उपभोक्ता के विश्वास' की रक्षा के एक नए मिशन पर निकल पड़े हैं।
11 Feb 2026
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शिमला/सोलन: हिमाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों और शांत ढलानों के बीच एक मौन क्रांति आकार ले रही है। इस बदलाव की कमान किसी पारंपरिक किसान ने नहीं, बल्कि भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त जांबाज, कर्नल दिव्या ठाकुर ने संभाली है। 37 वर्षों तक देश की सीमाओं की रक्षा करने के बाद, कर्नल ठाकुर अब 'मिट्टी की शुद्धता' और 'उपभोक्ता के विश्वास' की रक्षा के एक नए मिशन पर निकल पड़े हैं।
विरासत का गौरव और सेवा का नया संकल्प
कर्नल दिव्या ठाकुर की जड़ें सैन्य शौर्य में गहरी जमी हैं। वे 'कश्मीर के रक्षक' कहे जाने वाले महान ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह (महावीर चक्र, मरणोपरांत) के पोते हैं। 2019 में सेवानिवृत्ति के बाद, कर्नल ठाकुर ने देखा कि बाजार में 'जैविक' (Organic) शब्द का व्यापारिक दुरुपयोग हो रहा है। रसायनों से मुक्त होने का दावा करने वाली उपज अक्सर मानकों पर खरी नहीं उतरती थी। इसी बेईमानी को चुनौती देने के लिए उन्होंने अपने पैतृक बागों को पुनर्जीवित करने का फैसला किया।
सैन्य अनुशासन और आधुनिक कृषि का संगम
कर्नल ठाकुर का बाग पारंपरिक खेती से कहीं आगे है। उन्होंने M9 रूटस्टॉक वाली उन्नत किस्मों का उपयोग कर एक 'हाई डेंसिटी' (उच्च घनत्व) बाग स्थापित किया है। उनके काम करने के तरीके में वही सैन्य अनुशासन झलकता है जिसकी सीख उन्हें बचपन में सैनिक स्कूल और बाद में सैन्य अकादमी से मिली।
"ईमानदारी और सत्यनिष्ठा मेरे रक्त में है। मेरे लिए जैविक खेती केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का ही एक विस्तार है।" — कर्नल दिव्या ठाकुर
नवाचार: जब तकनीक बनी किसान की ढाल
कृषि के क्षेत्र में कर्नल ठाकुर ने आधुनिकता को पूरी तरह अपनाया है। हिमाचल में वे उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होंने महाराष्ट्र से लाकर 'सौर जैव-किण्वक' (Solar Bio-fermenter) स्थापित किया है। इसके जरिए वे प्राकृतिक खाद 'जीवामृत' तैयार करते हैं।
इतना ही नहीं, उनके बाग में 'फसल' नामक एक स्मार्ट उपकरण लगा है, जिसमें 11 सेंसर हैं। यह मशीन उन्हें मोबाइल पर ही सटीक जानकारी दे देती है कि:
पौधों को सिंचाई की कब आवश्यकता है।
कीटों या रोगों का हमला कब होने वाला है।
छिड़काव (Spray) के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन सा है।
चुनौतियों से सीधा मुकाबला
प्रमाणित जैविक खेती का रास्ता आसान नहीं है। सरकारी प्रमाणन की तीन वर्षीय कठोर प्रक्रिया और नौकरशाही की जटिलताओं के बावजूद कर्नल ठाकुर डिगे नहीं हैं। वे वर्तमान में हैदराबाद के प्रतिष्ठित संस्थान 'MANAGE' से प्राकृतिक खेती का विशेष पाठ्यक्रम भी कर रहे हैं, ताकि उनके ज्ञान में कोई कमी न रहे।
एक सामूहिक भविष्य की ओर
कर्नल ठाकुर का उद्देश्य केवल अपने बाग तक सीमित रहना नहीं है। वे अन्य किसानों को भी संगठित कर रहे हैं ताकि एक ऐसा समूह बनाया जा सके जो पारदर्शिता और नैतिकता के साथ शुद्ध जैविक फल लोगों की थाली तक पहुँचा सके।
हिमाचल की वादियों में कर्नल ठाकुर का यह प्रयास साबित करता है कि एक सैनिक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता; वह बस अपना मोर्चा बदल देता है। आज उनका मोर्चा देश के स्वास्थ्य और मिट्टी की उर्वरता को बचाना है।