शराबबंदी पर अपनों के 'तेवर': केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और RLM विधायक ने उठाई समीक्षा की मांग

बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून को लागू हुए लगभग एक दशक बीतने को है, लेकिन इसे लेकर सत्ता पक्ष के भीतर से ही विरोध और समीक्षा के सुर अब मुखर होने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक जीतन राम मांझी ने शराबबंदी को लेकर नीतीश सरकार पर सीधा हमला बोला है। गया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मांझी ने स्पष्ट कहा कि राज्य को इस कानून से भारी आर्थिक क्षति हो रही है और अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस पर गंभीरता से पुनर्विचार करें।

18 Feb 2026  |  27

गया/पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून को लागू हुए लगभग एक दशक बीतने को है, लेकिन इसे लेकर सत्ता पक्ष के भीतर से ही विरोध और समीक्षा के सुर अब मुखर होने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक जीतन राम मांझी ने शराबबंदी को लेकर नीतीश सरकार पर सीधा हमला बोला है। गया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मांझी ने स्पष्ट कहा कि राज्य को इस कानून से भारी आर्थिक क्षति हो रही है और अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस पर गंभीरता से पुनर्विचार करें।

'छोटे प्यालों' पर सख्ती, 'बड़े सौदागरों' को छूट: मांझी

जीतन राम मांझी ने कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हुए पुलिसिया कार्यशैली को कटघरे में खड़ा किया। उनके प्रमुख तर्क निम्नलिखित हैं:

आर्थिक नुकसान: शराबबंदी के कारण बिहार के राजस्व को बड़ी चपत लग रही है, जबकि जनता का पैसा महंगी शराब के जरिए दूसरे राज्यों में जा रहा है।

वादाखिलाफी का आरोप: मांझी के अनुसार, तीसरी समीक्षा बैठक में यह सहमति बनी थी कि 'एक पौआ' या कम मात्रा में शराब का सेवन करने वालों को पुलिस परेशान नहीं करेगी, लेकिन जमीन पर इसका उल्टा हो रहा है।

होम डिलीवरी और भ्रष्टाचार: उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में शराबबंदी केवल कागजों पर है, असल में धड़ल्ले से 'होम डिलीवरी' हो रही है। पुलिस छोटे उपभोक्ताओं को पकड़ रही है, जबकि लाखों लीटर की तस्करी करने वाले माफिया पैसे के दम पर छूट रहे हैं।

विधानसभा में भी गूंजी समीक्षा की मांग

शराबबंदी की समीक्षा की बहस केवल मांझी तक सीमित नहीं रही। हाल ही में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के विधायक माधव आनंद ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री की मौजूदगी में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।

"बिहार में शराबबंदी को लागू हुए 10 साल होने को हैं। अब यह मूल्यांकन करने का वक्त है कि हमने इस कानून से क्या खोया और क्या पाया। कानून होने के बावजूद होम डिलीवरी का तंत्र सक्रिय है।" — माधव आनंद, विधायक, RLM

हालांकि माधव आनंद ने इस कड़े फैसले के लिए नीतीश कुमार के साहस की सराहना भी की, लेकिन उन्होंने जमीनी हकीकत को देखते हुए एक व्यापक और वैज्ञानिक समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

पृष्ठभूमि: 2016 से प्रभावी है कानून

विदित हो कि बिहार सरकार ने 1 अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में शराब की बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस 'ड्रीम प्रोजेक्ट' को महिलाओं के सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। परंतु, हालिया जहरीली शराब की घटनाओं और विपक्ष के साथ-साथ अब सहयोगियों के बढ़ते दबाव ने सरकार को असहज कर दिया है।

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