वोटर लिस्ट विवाद: सुप्रीम कोर्ट का आदेश, न्यायिक अधिकारी करेंगे बंगाल में मतदाता सूची की जांच

पश्चिम बंगाल में 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) अभ्यास को लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच जारी खींचतान को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कलकाता हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस प्रक्रिया की निगरानी और दावों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) की नियुक्ति करें।

20 Feb 2026  |  14

नई दिल्ली/कोलकाता | पश्चिम बंगाल में 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) अभ्यास को लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच जारी खींचतान को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कलकाता हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस प्रक्रिया की निगरानी और दावों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) की नियुक्ति करें।

"भरोसे की कमी और दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप"

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच बढ़ते 'ट्रस्ट डेफिसिट' (विश्वास की कमी) पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा:

"दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच आरोपों और जवाबी आरोपों का यह परिदृश्य बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। वर्तमान में मतदाता सूची की विसंगतियों (Discrepancies) को लेकर दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी तरह अटकी हुई है।"

क्या है सुप्रीम कोर्ट का निर्देश?

अदालत ने माना कि मौजूदा परिस्थितियां 'असाधारण' हैं, इसलिए 'असाधारण आदेश' की आवश्यकता है:

न्यायिक अधिकारियों की तैनाती: कलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया गया है कि वे जिला न्यायाधीश या अतिरिक्त जिला न्यायाधीश रैंक के सेवारत और पूर्व न्यायिक अधिकारियों को इस कार्य के लिए नियुक्त करें।

दावों का निपटारा: ये अधिकारी प्रत्येक जिले में मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने से जुड़े दावों और आपत्तियों की निष्पक्षता से जांच करेंगे।

उच्च स्तरीय बैठक: कलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कल (शनिवार) राज्य चुनाव आयुक्त, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और अन्य शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक कर इस योजना की बारीकियों को तय करेंगे।

विवाद की जड़: राजनीतिक टकराव और ममता बनर्जी की चेतावनी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस महीने की शुरुआत में दिल्ली में चुनाव आयोग के साथ एक तनावपूर्ण बैठक की थी।

सीधे आरोप: ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर "भाजपा के एजेंट" के रूप में काम करने और वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर करने का आरोप लगाया है।

चुनौती: उन्होंने चेतावनी दी थी कि वे लाखों लोगों को चुनाव आयोग के सामने 'परेड' कराने के लिए दिल्ली ला सकती हैं।

तुलना: मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि असम जैसे भाजपा शासित राज्यों के बजाय केवल पश्चिम बंगाल और केरल को ही इस विशेष संशोधन (SIR) के लिए क्यों निशाना बनाया जा रहा है।

चुनाव आयोग के दावे

आयोग के सूत्रों ने आरोप लगाया कि बैठक के दौरान मुख्यमंत्री का व्यवहार आक्रामक था, जबकि आयोग ने संयम बनाए रखा। विवाद का एक मुख्य बिंदु उन अधिकारियों का रैंक भी है, जिन्हें राज्य सरकार ने चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ERO) के रूप में तैनात किया है। आयोग का मानना है कि इन पदों पर उच्च रैंक के अधिकारियों की कमी है।

मामले के मुख्य बिंदु

विषयवर्तमान स्थिति
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेपकलकाता हाईकोर्ट के माध्यम से न्यायिक पर्यवेक्षण।
विवाद का केंद्रमतदाता सूची में 'तार्किक विसंगतियां' और नामों का विलोपन।
राजनीतिक रंगममता बनर्जी बनाम चुनाव आयोग (बीजेपी पर मिलीभगत का आरोप)।
अगला कदमहाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के शीर्ष अधिकारियों की शनिवार को बैठक।

निष्कर्ष: निष्पक्षता सुनिश्चित करने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि न्यायपालिका अब चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच की 'दीवार' बनकर खड़ी हो गई है, ताकि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता पर कोई सवाल न उठे। न्यायिक अधिकारियों की उपस्थिति से जनता और राजनीतिक दलों के बीच इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ने की उम्मीद है।

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