'ग्रेटर इजराइल' का खौफ: अमेरिकी राजदूत के बयान से अरब जगत में उबाल, क्या बदलने वाला है मिडिल ईस्ट का नक्शा?
ध्य-पूर्व (Middle East) में एक बार फिर दशकों पुराने 'ग्रेटर इजराइल' के डर ने सिर उठा लिया है। इजराइल में अमेरिकी राजदूत के एक विवादास्पद बयान ने न केवल अरब देशों की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि ओआईसी (OIC) और अरब लीग जैसे शक्तिशाली संगठनों को अमेरिका के खिलाफ 'रेड लाइन' खींचने पर मजबूर कर दिया है।
23 Feb 2026
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दुबई/वॉशिंगटन मध्य-पूर्व (Middle East) में एक बार फिर दशकों पुराने 'ग्रेटर इजराइल' के डर ने सिर उठा लिया है। इजराइल में अमेरिकी राजदूत के एक विवादास्पद बयान ने न केवल अरब देशों की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि ओआईसी (OIC) और अरब लीग जैसे शक्तिशाली संगठनों को अमेरिका के खिलाफ 'रेड लाइन' खींचने पर मजबूर कर दिया है।
आशंका जताई जा रही है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान इजराइल की सुरक्षा के बहाने मध्य-पूर्व के भूगोल को फिर से लिखने की तैयारी की जा रही है।
इतिहास का आईना: बार-बार बदलती सरहदें
अरब देशों का डर बेवजह नहीं है; 1917 से लेकर अब तक इस क्षेत्र का नक्शा कई बार बदला जा चुका है:
1917: कोई इजराइल नहीं था, पूरा इलाका ब्रिटिश शासन के अधीन फिलिस्तीन था।
1948: इजराइल का गठन और पहले युद्ध के बाद इजराइली सीमाओं का विस्तार।
1967 (6-दिवसीय युद्ध): इजराइल ने गाजा, वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान हाइट्स पर कब्जा किया।
1995 (ओस्लो समझौता): वेस्ट बैंक को तीन अलग-अलग नियंत्रण क्षेत्रों (Area A, B, C) में बांट दिया गया।
शक्ति संतुलन और ईरान का कारक
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का असली निशाना ईरान को कमजोर करना है। अरब जगत को डर है कि यदि ईरान की शक्ति कम हुई, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन (Power Balance) पूरी तरह बिगड़ जाएगा। इससे इजराइल को 'ग्रेटर इजराइल' के सपने को हकीकत में बदलने का खुला मैदान मिल जाएगा।
अरब देशों की 'रेड लाइन' और एकजुटता
इस खतरे को देखते हुए 57 मुस्लिम देशों के संगठन OIC, अरब लीग (LAS) और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) पहली बार एक सुर में बोल रहे हैं:
"हमारी सीमाएं हमारी 'रेड लाइन' हैं। हम अपनी संप्रभुता और भूगोल के साथ किसी भी छेड़छाड़ की अनुमति अमेरिका को भी नहीं देंगे।"
अमेरिका का 'प्लान-बी': बिना अरब मदद के ईरान पर प्रहार?
तनाव के बीच अमेरिका ने अरब देशों की संभावित घेराबंदी का जवाब भी तैयार कर लिया है। यदि ईरान पर सैन्य कार्रवाई की स्थिति बनती है, तो अमेरिका को अरब देशों की जमीन या हवाई क्षेत्र (Airspace) की जरूरत नहीं होगी:
यूरोपीय रूट: हमले के लिए बुल्गारिया, ग्रीस और साइप्रस जैसे यूरोपीय देशों के अड्डों का उपयोग होगा।
हवाई ताकत: F-35 और F-16 फाइटर जेट्स भूमध्य सागर के अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र से उड़ान भरेंगे।
मिड-एयर रिफ्यूलिंग: KC-135 टैंकरों के जरिए हवा में ही ईंधन भरकर ईरान की सीमा तक पहुँच बनाई जाएगी।
निष्कर्ष: क्या यह एक नए युग की आहट है?
अमेरिकी राजदूत के बयान ने जिस कूटनीतिक आग को हवा दी है, उसने मध्य-पूर्व को एक दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव अमेरिका को नक्शा बदलने से रोक पाएगा, या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराते हुए नई सरहदें खींचेगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।