'गुलामी की मानसिकता' से मुक्ति: राष्ट्रपति भवन से हटेगी लुटियंस की प्रतिमा, राजाजी लेंगे जगह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए बताया कि राष्ट्रपति भवन परिसर से ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस (Edwin Lutyens) की प्रतिमा हटाई जाएगी। इसके स्थान पर भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (C. Rajagopalachari) यानी 'राजाजी' की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। केंद्र सरकार ने इस कदम को 'वि-औपनिवेशीकरण' (Decolonisation) के अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।
23 Feb 2026
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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए बताया कि राष्ट्रपति भवन परिसर से ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस (Edwin Lutyens) की प्रतिमा हटाई जाएगी। इसके स्थान पर भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (C. Rajagopalachari) यानी 'राजाजी' की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। केंद्र सरकार ने इस कदम को 'वि-औपनिवेशीकरण' (Decolonisation) के अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।
'लुटियंस दिल्ली' बनाम 'जन सामान्य' का नैरेटिव
लुटियंस का नाम केवल एक वास्तुकार का नहीं, बल्कि दिल्ली की उस विशिष्ट 'एलीट' (Elitist) संस्कृति का प्रतीक बन गया है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी अक्सर 'लुटियंस जमात' और 'खान मार्केट गैंग' कहकर संबोधित करते रहे हैं।
रणनीतिक चोट: इस प्रतिमा को हटाना उन अंग्रेजी बोलने वाले विशिष्ट वर्गों पर एक प्रतीकात्मक हमला है, जिन्हें भाजपा कांग्रेस समर्थित और 'मैकाले की शिक्षा पद्धति' का पोषक मानती है।
मोदी का रुख: मार्च 2025 में भी पीएम ने औपनिवेशिक कानूनों पर चुप्पी साधने के लिए इस वर्ग की आलोचना की थी। सरकार का मानना है कि लुटियंस की प्रतिमा को हटाना पश्चिमी मानसिकता पर 'ताला लगाने' जैसा है।
राजाजी का चयन: नेहरू के धुर विरोधी और स्वतंत्रता सेनानी
राजाजी की प्रतिमा लगाने के पीछे केवल उनकी 'भारतीयता' ही नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विचारधारा भी एक बड़ा कारण मानी जा रही है:
नेहरूवाद का विकल्प: राजाजी ने बाद में नेहरूवादी समाजवाद के विरोध में 'स्वतंत्र पार्टी' बनाई थी, जो मुक्त बाजार (Free Market) की समर्थक थी।
ऐतिहासिक महत्व: वह माउंटबेटन के बाद राष्ट्रपति भवन के पहले भारतीय निवासी थे। उनकी सादगी—सूती धोती और शाकाहारी जीवन—उन्हें लुटियंस की भव्यता का सटीक विलोम बनाती है।
तमिलनाडु चुनाव और 'द्रविड़ राजनीति' का पेच
हालांकि यह कदम तमिलनाडु चुनावों से पहले उठाया गया है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसका वहां कोई खास राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा:
बनाम पेरियार: तमिलनाडु की राजनीति में अब 'द्रविड़ आंदोलन' का बोलबाला है, जहाँ राजाजी (एक ब्राह्मण) को पेरियार ने पूरी तरह प्रतिस्थापित कर दिया है।
विरोधाभास: राजाजी ने 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी में 'अनिवार्य हिंदी' का समर्थन किया था, जिसने राज्य में पहले हिंदी विरोधी आंदोलन को जन्म दिया। हालांकि, बाद में उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ जाकर DMK का समर्थन भी किया था।
निष्कर्ष: प्रतीकों की बदलती राजनीति
जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने अपनी यादों में राजाजी को एक 'अत्यंत प्रभावशाली और सिद्धांतवादी' व्यक्ति बताया था। उनकी प्रतिमा को राष्ट्रपति भवन में स्थान देना इस बात का संकेत है कि वर्तमान सरकार स्वतंत्रता आंदोलन के उन नायकों को मुख्यधारा में लाना चाहती है, जो नेहरू युग के दौरान हाशिए पर चले गए थे।