नाम बदलने की सियासत: 'केरल' अब बनेगा 'केरलम', ममता बनर्जी ने 'दोहरे मापदंड' पर केंद्र को घेरा
केंद्र सरकार द्वारा केरल का आधिकारिक नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को हरी झंडी देने के फैसले ने देश में भाषाई अस्मिता और राजनीतिक पक्षपात की एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ एक ओर इसे केरल की सांस्कृतिक जड़ों की ओर वापसी माना जा रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए केंद्र की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
25 Feb 2026
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नई दिल्ली/कोलकाता | केंद्र सरकार द्वारा केरल का आधिकारिक नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को हरी झंडी देने के फैसले ने देश में भाषाई अस्मिता और राजनीतिक पक्षपात की एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ एक ओर इसे केरल की सांस्कृतिक जड़ों की ओर वापसी माना जा रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए केंद्र की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
सांस्कृतिक पहचान या चुनावी दांव?
केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस फैसले के तहत अब केरल को उसके पारंपरिक मलयालम नाम 'केरलम' से जाना जाएगा। हालांकि, इस बदलाव को पूरी तरह लागू करने के लिए अभी संसद की मंजूरी की आवश्यकता होगी।
राजनीतिक निहितार्थ: विश्लेषक इसे आगामी विधानसभा चुनावों से पहले क्षेत्रीय भावनाओं को साधने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
प्रशासनिक प्रक्रिया: नाम बदलने की इस कवायद में रेलवे, डाक विभाग और उड्डयन जैसे कई केंद्रीय मंत्रालयों को अपने रिकॉर्ड अपडेट करने होंगे।
ममता बनर्जी का प्रहार: "बंगाल के साथ भेदभाव क्यों?"
केरल के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर 'दोहरा रवैया' अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने याद दिलाया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा ने जुलाई 2018 में ही राज्य का नाम बदलकर 'बांग्ला' करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर केंद्र को भेजा था, जो पिछले कई वर्षों से धूल फांक रहा है।
"अगर केरल 'केरलम' हो सकता है, तो बंगाल 'बांग्ला' क्यों नहीं? हमारे प्रस्ताव पर वर्षों से चुप्पी साधना केंद्र की पक्षपाती राजनीति को दर्शाता है।" — ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
क्यों अटका है 'बांग्ला' का प्रस्ताव?
सरकारी सूत्रों और विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम बंगाल का नाम बदलने के मार्ग में कुछ प्रमुख बाधाएं हैं:
अंतरराष्ट्रीय भ्रम: विदेश मंत्रालय ने आपत्ति जताई है कि 'बांग्ला' नाम पड़ोसी देश 'बांग्लादेश' से काफी मिलता-जुलता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक और प्रशासनिक भ्रम पैदा हो सकता है।
ऐतिहासिक विरासत: केंद्र का एक पक्ष मानता है कि 'पश्चिम बंगाल' नाम 1947 के विभाजन की ऐतिहासिक यादों को संजोए हुए है, जिसे बदलना इतिहास को धुंधला करने जैसा होगा।
प्रशासनिक जटिलता: नाम बदलने की प्रक्रिया में भारी वित्तीय बोझ और व्यापक दस्तावेजी बदलाव शामिल हैं।
निष्कर्ष: पहचान की जंग या चुनावी हथियार?
राज्यों के नाम बदलने की यह कवायद केवल अक्षरों का फेरबदल नहीं है, बल्कि यह गहरी राजनीतिक और सांस्कृतिक परतों को समेटे हुए है। अब देखना यह होगा कि क्या केंद्र सरकार केरल की तरह बंगाल की मांग पर भी विचार करेगी, या 'बांग्ला' का मुद्दा आने वाले चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनेगा।