नई दिल्ली | कथित शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल के बरी होने के फैसले ने राजधानी के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। जहाँ आम आदमी पार्टी इसे अपनी 'ईमानदारी की जीत' बता रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने हमलावर रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यह रिहाई केवल 'साक्ष्यों की कमी' और 'तकनीकी आधार' पर हुई है, न कि बेगुनाही के प्रमाण पर।
"सबूत नष्ट किए, इसलिए मिली राहत" — वीरेंद्र सचदेवा
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जांच एजेंसियां शुरू से कह रही थीं कि केजरीवाल और सिसोदिया ने साक्ष्यों को नष्ट करने का काम किया है।
भाजपा अध्यक्ष के तीखे सवाल:
पुराने फोन और सिम कार्ड: सचदेवा ने सवाल उठाया कि जांच के दौरान बार-बार मोबाइल क्यों बदले गए? मांगने के बावजूद पुराने फोन और डिजिटल साक्ष्य सीबीआई को क्यों नहीं सौंपे गए?
6 गुना कमीशन का गणित: उन्होंने पूछा कि यदि शराब नीति सही थी, तो ठेकेदारों का कमीशन 2% से बढ़ाकर 12% क्यों किया गया?
नीति वापस क्यों ली: भाजपा ने घेरा कि मामला सामने आते ही आनन-फानन में उस शराब नीति को वापस क्यों लिया गया?
"केजरीवाल के पास खुद को ईमानदार कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। जनता ने उनकी सच्चाई देख ली है और तकनीकी कारणों से मिली यह राहत स्थायी नहीं है।" — वीरेंद्र सचदेवा
"उच्च अदालत में टिक नहीं पाएगा फैसला" — मनोज तिवारी
सांसद और भाजपा नेता मनोज तिवारी ने इस मामले को जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ बताया। उन्होंने दावा किया कि जांच एजेंसी ने इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील कर दी है।
मनोज तिवारी के मुख्य आरोप:
साक्ष्यों से छेड़छाड़: तिवारी ने कहा कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए केजरीवाल ने अधिकारियों के साथ मिलकर बड़ा घोटाला किया और साक्ष्यों को प्रभावित किया।
सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी: उन्होंने याद दिलाया कि इसी आशंका के चलते सर्वोच्च अदालत ने पहले केजरीवाल को फाइलों पर हस्ताक्षर करने से रोक दिया था।
जवाबदेही की मांग: तिवारी ने कहा कि यह केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि दिल्ली की जनता के हक की लड़ाई है।
आम आदमी पार्टी का पक्ष
दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी ने इन आरोपों को निराधार बताया है। पार्टी का कहना है कि अदालत से बरी होना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अरविंद केजरीवाल कट्टर ईमानदार हैं और पूरा मामला केवल राजनीतिक द्वेष से प्रेरित था।
निष्कर्ष
राजधानी की राजनीति अब 'अदालती जंग' से निकलकर 'जनता की अदालत' की ओर मुड़ गई है। भाजपा जहां इसे 'सबूत मिटाने' का खेल बता रही है, वहीं 'आप' इसे अपनी छवि सुधारने के मौके के रूप में देख रही है। अब सबकी निगाहें ऊपरी अदालत के रुख पर टिकी हैं।