आईटी सेक्टर में 'एआई' का कोहराम: 60 लाख नौकरियों पर संकट या 2 लाख करोड़ का नया बाजार?

भारतीय आईटी (IT) सेक्टर इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े 'टर्बुलेंस' यानी उथल-पुथल से गुजर रहा है। 18 लाख करोड़ रुपये का यह साम्राज्य, जो कभी लाखों युवाओं को कोडिंग की नौकरी देता था, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की लहर में अपनी नई पहचान तलाश रहा है।

27 Feb 2026  |  71

भारतीय आईटी (IT) सेक्टर इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े 'टर्बुलेंस' यानी उथल-पुथल से गुजर रहा है। 18 लाख करोड़ रुपये का यह साम्राज्य, जो कभी लाखों युवाओं को कोडिंग की नौकरी देता था, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की लहर में अपनी नई पहचान तलाश रहा है।

Q1. भारतीय आईटी सेक्टर में अचानक इतनी खलबली क्यों मची है?

जवाब: पिछले 25 साल से भारत 'दुनिया का बैक ऑफिस' रहा है, जहाँ प्रोग्रामर्स कोड लिखते थे। अब AI खुद प्रोग्रामिंग करने लगा है। कोडिंग अब एक 'कमोडिटी' (आम वस्तु) बन गई है। विदेशी क्लाइंट्स अब सिर्फ कोड लिखवाने के लिए पैसे नहीं देंगे, बल्कि वे 'इंटेलिजेंस ऑडिट' और एआई एल्गोरिदम के प्रबंधन को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसी बदलाव के डर से फरवरी 2026 में आईटी कंपनियों की मार्केट वैल्यू 68.6 अरब डॉलर (लगभग 6.4 लाख करोड़ रुपये) घट गई है।

Q2. टीसीएस (TCS) अपने ही राजस्व का नुकसान क्यों करवा रही है?

जवाब: टीसीएस के सीईओ के. कृतिवासन ने कर्मचारियों से कहा है कि वे काम को तेज और सस्ता करने के लिए एआई का इस्तेमाल करें, भले ही इससे कंपनी के बिलिंग या राजस्व में कमी आए।

रणनीति: कंपनी का मानना है कि अगर वे खुद को नहीं बदलेंगे, तो कोई और उनकी जगह ले लेगा।

विप्रो का रुख: विप्रो का भी मानना है कि पुराने काम खत्म होंगे, लेकिन एआई से नए अवसर पैदा होंगे।

Q3. क्या वाकई 60 लाख कोडिंग नौकरियां खत्म हो जाएंगी?

जवाब: खतरा वास्तविक है। भारत के लगभग 300 अरब डॉलर के आईटी उद्योग का 40% से 70% राजस्व 'एप्लीकेशन सर्विसेज' से आता है, जो काफी हद तक श्रम-प्रधान (Labor-heavy) है। एआई इस काम को कम लोगों के साथ कर सकता है। टीसीएस और इंफोसिस जैसी दिग्गज कंपनियां एआई अपनाकर अपना मुनाफा तो बचा लेंगी, लेकिन वे भविष्य में पहले की तरह बड़े पैमाने पर भर्तियां (Mass Hiring) नहीं करेंगी। यह 37.5 करोड़ भारतीय युवाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है।

Q4. यह 'एआई टोकन हब' क्या है और भारत इससे 19 अरब डॉलर कैसे कमाएगा?

जवाब: भविष्य 'कोड' का नहीं, 'टोकन' (AI द्वारा जनरेट की गई डेटा यूनिट) का है।

लक्ष्य: 2030 तक भारत सालाना 12 क्वाड्रिलियन टोकन पैदा करेगा।

कमाई: इन टोकन के निर्यात से डेटा सेंटर्स को 19 अरब डॉलर (करीब 1.74 लाख करोड़ रुपये) का राजस्व मिल सकता है।

सरकारी प्रोत्साहन: केंद्र सरकार विदेशी कंपनियों को भारत में 'टोकन कारखाने' लगाने के लिए 20 साल की टैक्स छूट दे रही है। भारत की सस्ती सौर ऊर्जा और डेटा सेंटर नीति इसे एक ग्लोबल हब बना रही है।

Q5. शेयर बाजार और विदेशी निवेशकों (FIIs) में डर क्यों है?

जवाब: निवेशकों को डर है कि एआई भारतीय कंपनियों के पारंपरिक बिजनेस मॉडल को ध्वस्त कर देगा।

फरवरी का झटका: निफ्टी आईटी इंडेक्स में 19.13% की भारी गिरावट आई है, जो पिछले 23 वर्षों का सबसे खराब महीना रहा।

एंथ्रोपिक का असर: अमेरिकी स्टार्टअप 'एंथ्रोपिक' के नए एआई टूल्स (जैसे क्लाउड कोवर्क एजेंट) ने बाजार में यह चिंता बढ़ा दी है कि अब मानवीय कोडर की जरूरत कम होगी।

बिकवाली: विदेशी संस्थागत निवेशकों ने फरवरी के पहले हफ्ते में ही 11,000 करोड़ रुपये के आईटी शेयर बेच दिए।

आगे की राह: क्या करना होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अब रणनीति बदलने का समय है:

नेशनल रिसर्च क्लाउड: विदेशी कंपनियों को बिजली देने के बदले उनसे हाई-बैंडविड्थ मेमोरी चिप्स की मांग की जानी चाहिए ताकि देश के 500 विश्वविद्यालयों के लिए रिसर्च क्लाउड बने।

सुपरवाइजर की भूमिका: युवाओं को सिर्फ कोडर नहीं, बल्कि एआई एजेंटों और रोबोट्स को मैनेज करने वाला 'एआई सुपरवाइजर' या 'मैनेजर' बनना होगा।

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