प्रकाश झा का 'सिनेमाई सस्पेंस': 2016 के बाद क्यों नहीं आई कोई फीचर फिल्म? राजनीति और सामाजिक यथार्थ के बेबाक चितेरे का फैन्स को इंतजार

हिंदी सिनेमा में जब बिहार के किरदारों को सिर्फ हंसी-मजाक या नौकरों की भूमिकाओं तक सीमित रखा जाता था, तब प्रकाश झा ने इस धारणा को तोड़कर 'बिहारी पहचान' को एक साहसी और राजनीतिक मुख्यधारा के पात्र के रूप में पेश किया। लेकिन साल 2016 की फिल्म 'जय गंगाजल' के बाद से प्रकाश झा ने बड़े पर्दे के लिए किसी फिल्म का निर्देशन नहीं किया है। आखिर क्या वजह है कि राजनीति और अपराध के गठजोड़ को उघाड़ने वाला यह फिल्मकार आज खुद निर्देशन से दूर है?

27 Feb 2026  |  106

मुंबई/पटना |  हिंदी सिनेमा में जब बिहार के किरदारों को सिर्फ हंसी-मजाक या नौकरों की भूमिकाओं तक सीमित रखा जाता था, तब प्रकाश झा ने इस धारणा को तोड़कर 'बिहारी पहचान' को एक साहसी और राजनीतिक मुख्यधारा के पात्र के रूप में पेश किया। लेकिन साल 2016 की फिल्म 'जय गंगाजल' के बाद से प्रकाश झा ने बड़े पर्दे के लिए किसी फिल्म का निर्देशन नहीं किया है। आखिर क्या वजह है कि राजनीति और अपराध के गठजोड़ को उघाड़ने वाला यह फिल्मकार आज खुद निर्देशन से दूर है?

बिहार को बनाया अपनी कहानियों का 'एपिक सेंटर'

प्रकाश झा की फिल्मों की खूबसूरती उनके भव्य सेट्स में नहीं, बल्कि उन छोटे कस्बों और गाँवों में होती थी जहाँ सत्ता का तांडव और मजदूरों का शोषण साथ-साथ चलता था। उन्होंने अजय देवगन, कैटरीना कैफ और अमिताभ बच्चन जैसे सितारों को उन कहानियों में पिरोया जो विशुद्ध रूप से सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य पर आधारित थीं।

प्रमुख फिल्में: दामुल, अपहरण, गंगाजल, राजनीति, आरक्षण, सत्याग्रह।

विषय: बंधुआ मजदूरी, फिरौती के लिए अपहरण, आरक्षण की आग और नक्सलवाद।

2016 के बाद बदला यात्रा का मिजाज

साल 2016 में आई 'जय गंगाजल' उनके निर्देशन की आखिरी फीचर फिल्म साबित हुई। इसमें उन्होंने खुद डीएसपी भोलानाथ सिंह की भूमिका निभाकर अभिनय में अपनी पकड़ दिखाई। इसके बाद उनका ध्यान निर्देशन से हटकर अभिनय और निर्माण (Production) की ओर अधिक मुड़ा।

अभिनय में सक्रियता: 'सांड़ की आंख' और 'मट्टू की साइकिल' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने दमदार अभिनय से चौंकाया।

निर्माण: 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्खा' और 'फ्रॉड सैया' जैसी फिल्मों को उन्होंने अपने बैनर तले प्रमोट किया।

ओटीटी पर 'आश्रम' का तहलका

जब बड़े पर्दे पर उनकी फिल्में नहीं आ रही थीं, तब 2020 में प्रकाश झा ने ओटीटी का रुख किया और 'आश्रम' वेब सीरीज बनाई। यहाँ भी उनका पुराना 'तेवर' दिखा। उन्होंने धर्म, अंधविश्वास और अपराध के नापाक गठजोड़ को जिस बेबाकी से दिखाया, उस पर खूब विवाद भी हुए और प्रशंसा भी मिली। लेकिन 'आश्रम' के बाद ओटीटी पर भी उनका निर्देशन थम सा गया है।

प्रशंसकों की बढ़ती जिज्ञासा: क्या लौटेगा वह 'राजनीतिक' तेवर?

प्रकाश झा केवल एक निर्देशक नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतना वाले व्यक्तित्व हैं। वे दो बार चुनाव लड़ चुके हैं और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय रहे हैं। उनकी फिल्मों का स्वर हमेशा से विद्रोही रहा है। आज के दौर में जब समाज और राजनीति के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, उनके प्रशंसक यह महसूस करते हैं कि प्रकाश झा जैसे फिल्मकार की कमी खल रही है।

सवाल जो फैन्स पूछ रहे हैं:

क्या प्रकाश झा आज के जटिल राजनीतिक परिवेश पर कोई बड़ी फिल्म लिखने में व्यस्त हैं?

क्या अभिनय की ओर उनके बढ़ते झुकाव ने निर्देशक को पीछे छोड़ दिया है?

क्या वे 'आश्रम' की सफलता के बाद ओटीटी के लिए ही कुछ बड़ा प्लान कर रहे हैं?

निष्कर्ष

सिनेमाई गलियारों में चर्चा है कि प्रकाश झा जल्द ही किसी बड़े प्रोजेक्ट के साथ वापसी कर सकते हैं। 'दामुल' से लेकर 'जय गंगाजल' तक जिस साहस के लिए वे जाने जाते रहे हैं, उसके नजीर अब फिल्मी पर्दे पर कम ही दिखते हैं। ऐसे में उनके प्रशंसकों को उम्मीद है कि वे एक बार फिर उसी पुराने तेवर के साथ लौटेंगे और सिस्टम के चेहरे से नकाब उतारने वाली कोई नई मास्टरपीस देंगे।

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