'भद्रा' का साया पड़ते ही क्यों रुक जाते हैं शुभ काम? जानें सूर्यपुत्री की अनसुनी कथा

हिंदू पंचांग और ज्योतिष शास्त्र में 'समय' को सबसे बलवान माना गया है। अक्सर त्योहारों या मांगलिक कार्यों के अवसर पर हम 'भद्रा' (Bhadra Kaal) शब्द सुनते हैं, जिसके आते ही पंडित और ज्योतिषी शुभ कार्यों को रोकने की सलाह देते हैं। आखिर कौन है यह भद्रा, जिसका नाम सुनते ही लोग सहम जाते हैं और क्यों इसे मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित माना गया है? आइए विस्तार से जानते हैं।

05 Mar 2026  |  169

नई दिल्ली | अध्यात्म डेस्क हिंदू पंचांग और ज्योतिष शास्त्र में 'समय' को सबसे बलवान माना गया है। अक्सर त्योहारों या मांगलिक कार्यों के अवसर पर हम 'भद्रा' (Bhadra Kaal) शब्द सुनते हैं, जिसके आते ही पंडित और ज्योतिषी शुभ कार्यों को रोकने की सलाह देते हैं। आखिर कौन है यह भद्रा, जिसका नाम सुनते ही लोग सहम जाते हैं और क्यों इसे मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित माना गया है? आइए विस्तार से जानते हैं।

कौन हैं भद्रा? (पौराणिक पृष्ठभूमि)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भद्रा भगवान सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया की पुत्री हैं। वे न्याय के देवता शनिदेव की सगी बहन हैं। जिस प्रकार शनिदेव का स्वभाव कड़ा माना जाता है, वैसे ही भद्रा भी जन्म से ही अत्यंत उग्र, क्रोधी और प्रभावशाली स्वभाव की हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि भद्रा का स्वरूप और स्वभाव इतना तेज है कि उनके पृथ्वी लोक पर प्रवास के दौरान किए गए शुभ कार्यों में विघ्न आने की आशंका प्रबल हो जाती है।

ज्योतिष का गणित: क्या है 'विष्टि करण'?

पंचांग के अनुसार, समय की गणना के लिए कुल 11 करण (Karanas) निर्धारित किए गए हैं। इन्हीं में से एक करण का नाम है 'विष्टि करण'

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब भी किसी तिथि में विष्टि करण का प्रवेश होता है, तो उस विशिष्ट समय को 'भद्रा काल' कहा जाता है। इसे एक अशुभ घड़ी माना गया है जिसमें दैवीय ऊर्जा का सकारात्मक प्रवाह कम हो जाता है।

क्या भद्रा हमेशा अशुभ होती है?

एक आम धारणा है कि भद्रा सदैव नकारात्मक फल देती है, लेकिन ज्योतिष शास्त्र इसे पूरी तरह सही नहीं मानता। भद्रा का अशुभ प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका 'वास' कहाँ है:

स्वर्ग या पाताल लोक: यदि भद्रा स्वर्ग या पाताल में निवास कर रही हो, तो उसका दुष्प्रभाव पृथ्वी वासियों पर नहीं पड़ता।

पृथ्वी लोक: समस्या तब उत्पन्न होती है जब भद्रा का वास पृथ्वी लोक पर होता है। केवल इसी स्थिति में मांगलिक कार्यों से बचने की सख्त सलाह दी जाती है।

भद्रा काल में वर्जित कार्य

धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, इस काल में निम्नलिखित कार्यों को करना शुभ नहीं माना जाता:

विवाह और सगाई: वैवाहिक जीवन में बाधाओं की आशंका रहती है।

गृह प्रवेश: नए घर में सुख-शांति के लिए भद्रा का त्याग अनिवार्य है।

नया व्यापार: बिजनेस या किसी भी नए निवेश की शुरुआत इस समय नहीं करनी चाहिए।

शुभ संस्कार: मुंडन, यज्ञोपवीत या रक्षाबंधन जैसे पवित्र धागे बांधने के लिए भद्रा मुक्त समय ही श्रेष्ठ है।

निष्कर्ष: भद्रा काल हमें यह सिखाता है कि प्रकृति और ग्रहों की चाल का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। संयम और सही समय का चयन ही सफलता की कुंजी है।

अन्य खबरें