नई दिल्ली/बीजिंग। पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में गहराते संघर्ष ने भारत की कृषि व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। ईरान में अमेरिका-इजरायल के हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण भारत की तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति बाधित हो गई है। इसका सीधा असर खाद (Fertilizer) उत्पादन पर पड़ा है, जिसके चलते भारत ने अपने पड़ोसी और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंदी चीन से यूरिया निर्यात पर लगी पाबंदियों को हटाने का असामान्य अनुरोध किया है।
क्यों जरूरी हुआ चीन का दरवाजा खटखटाना?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक है। खाद बनाने के लिए 'प्राकृतिक गैस' एक अनिवार्य कच्चा माल (Feedstock) है।
गैस की किल्लत: कतर जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं ने पिछले सप्ताह भारत को ईंधन की शिपमेंट में कटौती कर दी है।
उत्पादन पर असर: भारत में खाद कंपनियों को उनकी जरूरत की केवल 70% गैस मिल पा रही है, जिससे कई निर्माताओं ने उत्पादन कम कर दिया है या प्लांट बंद करने पर मजबूर हैं।
चीन की भूमिका: चीन दुनिया का शीर्ष यूरिया उत्पादक है, लेकिन उसने घरेलू जरूरतों और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए निर्यात पर कोटा सिस्टम लगा रखा है।
जून के 'मानसून' और 'बुवाई' पर नजर
हालांकि वर्तमान में भारत के पास यूरिया की तत्काल कमी नहीं है, लेकिन सरकार दूरगामी रणनीति पर काम कर रही है।
जून की चुनौती: जून में मानसून के आगमन के साथ ही देश में बुवाई का मुख्य सीजन शुरू हो जाता है। यदि गैस आपूर्ति में व्यवधान लंबा चला, तो भारत को यूरिया के भारी स्टॉक की आवश्यकता होगी।
आयात का गणित: चालू वित्त वर्ष में भारत अब तक 9.8 मिलियन टन यूरिया आयात कर चुका है। अगले तीन महीनों में 1.7 मिलियन टन और आने की उम्मीद है।
विकल्प: पश्चिम एशिया से होने वाली कमी की भरपाई के लिए भारत अब चीन, रूस, इंडोनेशिया, मलेशिया और मिस्र जैसे देशों की ओर देख रहा है।
आर्थिक कूटनीति में बदलाव के संकेत
दिलचस्प बात यह है कि यह अनुरोध ऐसे समय में आया है जब भारत ने हाल ही में पड़ोसी देशों (विशेषकर चीन) के लिए निवेश नियमों में ढील दी है। यह कदम दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है: "चावल, गेहूं और चीनी के प्रमुख निर्यातक के रूप में भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत है। यदि खाद की कमी होती है, तो इसका असर न केवल भारत की खेती पर, बल्कि वैश्विक खाद्य कीमतों पर भी पड़ेगा। यही कारण है कि भारत हर हाल में यूरिया का बफर स्टॉक सुरक्षित करना चाहता है।"