संगीत की अमर संवेदना: जब आर.डी. बर्मन के निधन के शोक में नुसरत फतेह अली खान ने गाया 'बैंडिट क्वीन' का वो दर्दनाक गीत

संगीत की दुनिया में सरहदों के पार भी कलाकार एक-दूसरे की कला का कितना सम्मान करते हैं, इसकी एक दिल छू लेने वाली कहानी हाल ही में फिल्म निर्देशक शेखर कपूर ने साझा की है। यह किस्सा जुड़ा है कव्वाली के शहंशाह नुसरत फतेह अली खान और भारतीय संगीत के जादूगर आर.डी. बर्मन (पंचम दा) से।

14 Mar 2026  |  109

नई दिल्ली | संगीत की दुनिया में सरहदों के पार भी कलाकार एक-दूसरे की कला का कितना सम्मान करते हैं, इसकी एक दिल छू लेने वाली कहानी हाल ही में फिल्म निर्देशक शेखर कपूर ने साझा की है। यह किस्सा जुड़ा है कव्वाली के शहंशाह नुसरत फतेह अली खान और भारतीय संगीत के जादूगर आर.डी. बर्मन (पंचम दा) से।

लाहौर का वो स्टूडियो और 'मिस्टर इंडिया' की धुनें

शेखर कपूर ने यादों के झरोखे से बताया कि 90 के दशक में जब वह फिल्म 'बैंडिट क्वीन' पर काम कर रहे थे, तब वह संगीत की रिकॉर्डिंग के लिए लाहौर गए थे। वहां के स्टूडियो का माहौल देखकर वह हैरान रह गए; पाकिस्तानी संगीतकार उनकी ही फिल्म 'मिस्टर इंडिया' और 'मासूम' की धुनें बजा रहे थे। इसी दौरान खान साहब (नुसरत फतेह अली खान) और शेखर कपूर के बीच संगीत पर चर्चा शुरू हुई।

पंचम दा के निधन की खबर और खान साहब का शोक

4 जनवरी 1994 को जब आर.डी. बर्मन के निधन की खबर आई, तो पूरी दुनिया के साथ-साथ नुसरत फतेह अली खान भी गहरे सदमे में डूब गए। वे पंचम दा के संगीत के बहुत बड़े प्रशंसक थे। शेखर कपूर बताते हैं कि जिस दिन यह दुखद समाचार मिला, उसी दौरान उन्हें फिल्म के एक बेहद गंभीर दृश्य के लिए गाना रिकॉर्ड करना था।

"मेरी आंखों में देखिए और फिल्म महसूस कीजिए"

फिल्म 'बैंडिट क्वीन' में एक हृदयविदारक दृश्य था जहाँ चिताएं जल रही थीं और लोग शोक मना रहे थे। नुसरत साहब ने उस दृश्य को देखा और निर्देशक से कहा:

"आप बस मेरी आंखों में देखिए और फिल्म देखिए, मैं गाऊंगा।"

शेखर कपूर कहते हैं कि वह गाना 'छोटी सी उम्र' दरअसल आर.डी. बर्मन के लिए खान साहब का विलाप (शोक गीत) बन गया। वह रिकॉर्डिंग के समय शेखर की आंखों में देख रहे थे और उनके भीतर पंचम दा के खोने का गम उमड़ रहा था। यही कारण है कि उस गाने में जो दर्द सुनाई देता है, वह केवल फिल्म के दृश्य का नहीं, बल्कि एक महान कलाकार का दूसरे महान कलाकार को दिया गया 'संगीत का अर्घ्य' था।

एक संयोग जिसने गाने को अमर बना दिया

दिलचस्प बात यह है कि 'छोटी सी उम्र' को पहले नुसरत साहब नहीं गाने वाले थे। लेकिन जब उन्होंने इस धुन को सुना और आर.डी. बर्मन के जाने का दुख उनके जेहन में था, तो उन्होंने खुद इसे गाने की इच्छा जताई। आज यह गाना न केवल फिल्म की आत्मा है, बल्कि दो महान संगीतकारों के अटूट जुड़ाव का प्रतीक भी है।

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