नई दिल्ली | विशेष संवाददाता पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में गहराते युद्ध के बादलों ने अब भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के बाद अब भारत के लिए खाद (फर्टिलाइजर) की निर्बाध आपूर्ति एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ते तनाव और शिपिंग रूट बाधित होने से देश में यूरिया और डीएपी जैसी जरूरी खादों की किल्लत और कीमतों में उछाल की आशंका प्रबल हो गई है।
आयात पर बढ़ती निर्भरता और बिगड़ता गणित
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार:
रिकॉर्ड आयात: फरवरी 2026 तक भारत लगभग 9.8 मिलियन टन तैयार उर्वरक का आयात कर चुका है।
बढ़ता खर्च: विशेषज्ञों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 में खाद आयात का बिल 18 अरब डॉलर (लगभग 76% की वृद्धि) तक पहुंच सकता है।
सब्सिडी का बोझ: वर्तमान में भारत का खाद सब्सिडी बिल 1.86 लाख करोड़ रुपये है, जो कुल सरकारी सब्सिडी का 40% से अधिक है। आपूर्ति मार्ग बाधित होने से मालभाड़ा (Freight) बढ़ेगा, जिसका सीधा असर सरकारी खजाने और किसानों की जेब पर पड़ सकता है।
क्यों डरा रहा है 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का बंद होना?
भारत अपनी यूरिया की जरूरतों के लिए मुख्य रूप से ओमान, सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे खाड़ी देशों पर निर्भर है। ईरान द्वारा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के मार्ग में उत्पन्न बाधाओं के कारण इन देशों से आने वाली सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है। यदि यह गतिरोध लंबा खिंचा, तो खरीफ सीजन की बुआई कर रहे किसानों के लिए डीएपी और यूरिया की उपलब्धता एक गंभीर समस्या बन जाएगी।
"रूस-यूक्रेन युद्ध के समय हमने देखा था कि खाद की कीमतें $17 अरब के पार चली गई थीं। वर्तमान मिडिल ईस्ट संकट उसी तरह की वैश्विक अस्थिरता पैदा कर रहा है।"
आयात के प्रमुख आंकड़े: एक नजर में
| उर्वरक का प्रकार | आयात में वृद्धि (प्रतिशत) | समय सीमा (अप्रैल-दिसंबर) |
|---|---|---|
| कुल खाद आयात | 69% ↑ | 14.45 मिलियन टन |
| यूरिया | 85% ↑ | 8 मिलियन टन |
| डीएपी (DAP) | 46% ↑ | - |
भारत की 'प्लान-बी' रणनीति: नए बाजारों की तलाश
संकट की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने अब 'मिडिल ईस्ट' से हटकर वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है।
नए समझौते: सरकार ने रूस, मोरक्को और सऊदी अरब के साथ दीर्घकालिक अनुबंधों के जरिए 86 लाख मीट्रिक टन खाद की आपूर्ति सुरक्षित करने का प्रयास किया है।
विकल्पों का विस्तार: मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, अब भारत इंडोनेशिया, बेलारूस और रूस जैसे देशों से व्यापार बढ़ाने की संभावनाओं पर काम कर रहा है ताकि किसी भी आपात स्थिति में घरेलू बाजार में खाद की कमी न हो।
निष्कर्ष: यद्यपि देश में यूरिया का घरेलू उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन एनपीके और डीएपी के लिए निर्भरता अभी भी विदेशी बाजारों पर है। यदि पश्चिम एशिया का तनाव युद्ध में तब्दील होता है, तो भारत को न केवल महँगी खाद खरीदनी होगी, बल्कि रसद (logistics) की चुनौतियों से भी जूझना पड़ेगा।