नई दिल्ली: एक ओर जहां केंद्र सरकार 'प्राकृतिक खेती' (Natural Farming) को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर कीटनाशक निर्माता कंपनियों के संगठन 'क्रॉपलाइफ इंडिया' ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। संगठन का कहना है कि यदि आधुनिक फसल सुरक्षा उपकरणों (कीटनाशकों) का उपयोग बंद कर दिया गया, तो कीटों के हमले से 30 से 50 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो सकती है, जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी।
जैविक खेती बनाम कीटनाशक: एक बड़ा खुलासा
क्रॉपलाइफ इंडिया ने अपने स्पष्टीकरण में एक प्रचलित भ्रांति को दूर करते हुए कहा कि जैविक (ऑर्गेनिक) खेती पूरी तरह से कीटनाशक मुक्त नहीं होती है।
संगठन के अनुसार, जैविक खेती में भी नीम के अर्क और 'पायरेथ्रम' (Pyrethrum) जैसे स्वीकृत प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है।
उन्होंने तर्क दिया कि चाहे कीटनाशक प्राकृतिक हो या सिंथेटिक, दोनों को बाजार में आने से पहले कड़े सुरक्षा मानकों को पूरा करना होता है।
खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर खतरा
उद्योग निकाय ने चेतावनी दी कि फसल सुरक्षा साधनों के बिना पैदावार में भारी गिरावट आएगी। इससे न केवल बाजारों में खाद्यान्न की उपलब्धता कम होगी, बल्कि किसानों की आय पर भी सीधा प्रहार होगा।
"बिना उचित सुरक्षा के कीटों का प्रकोप 50% तक फसल चट कर सकता है। यह न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि देश के हर नागरिक की थाली को प्रभावित करेगा।" — क्रॉपलाइफ इंडिया
सरकार का रुख: प्राकृतिक खेती ही भविष्य?
यह बयान ऐसे समय में आया है जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में 'प्राकृतिक खेती' की पुरजोर वकालत की है। उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ कहा था:
यदि सही प्रक्रिया अपनाई जाए, तो प्राकृतिक खेती से उत्पादकता कम नहीं होती, बल्कि वैज्ञानिकों ने इसे बढ़ते हुए भी देखा है।
सरकार का लक्ष्य देश को धीरे-धीरे रसायनों और उर्वरकों से मुक्त खेती की ओर ले जाना है ताकि 'धरती मां' के स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।
टकराव की स्थिति
जहाँ सरकार रसायनों से दूरी बनाकर स्वास्थ्य और पर्यावरण को प्राथमिकता दे रही है, वहीं एग्री-केमिकल इंडस्ट्री इसे व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण बता रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में 'उत्पादकता' और 'स्वच्छ भोजन' के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।