खेत में 'सोना' और मंडियों में 'मिट्टी' के भाव: पंजाब के आलू किसानों की बेबसी, फसल पर ट्रैक्टर चलाने को मजबूर अन्नदाता

पंजाब में इन दिनों आलू की खोदाई का सीजन अपने चरम पर है, लेकिन किसानों के चेहरों पर खुशी के बजाय मायूसी छाई है। आलम यह है कि आलू के दाम इतने गिर चुके हैं कि किसानों की लागत निकलना तो दूर, फसल को खेत से निकालने की मजदूरी भी पूरी नहीं हो पा रही है। इस संकट के बीच, पंजाब के छोटे किसान अपनी तैयार फसल पर ट्रैक्टर चलाने या उसे मुफ्त में बांटने को मजबूर हैं।

21 Mar 2026  |  123

 

चंडीगढ़/जालंधर: पंजाब में इन दिनों आलू की खोदाई का सीजन अपने चरम पर है, लेकिन किसानों के चेहरों पर खुशी के बजाय मायूसी छाई है। आलम यह है कि आलू के दाम इतने गिर चुके हैं कि किसानों की लागत निकलना तो दूर, फसल को खेत से निकालने की मजदूरी भी पूरी नहीं हो पा रही है। इस संकट के बीच, पंजाब के छोटे किसान अपनी तैयार फसल पर ट्रैक्टर चलाने या उसे मुफ्त में बांटने को मजबूर हैं।

लागत ₹4 और दाम ₹2: किसान की कमर टूटी

फाजिल्का और कपूरथला जैसे जिलों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे विचलित करने वाली हैं। अबोहर के किसान अजय वधवा ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि आलू निकालने की मजदूरी ही ₹2 प्रति किलो आ रही है, जबकि बाजार में पूरी फसल का दाम भी ₹2 से ₹3 प्रति किलो ही मिल रहा है। खाद, बीज और सिंचाई का खर्च जोड़ लिया जाए, तो किसान भारी घाटे में है।

"हमने बच्चों की तरह फसल पाली थी, लेकिन अब उसे निकालने का खर्च उठाने की हिम्मत नहीं है। इसलिए खेत पर ट्रैक्टर चलाना ही आखिरी रास्ता बचा है।" > — एक पीड़ित किसान

अनुबंध खेती (Contract Farming) का धोखा

मोगा के किसानों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जिन बड़ी कंपनियों ने अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के तहत आलू की बिजाई करवाई थी, अब वे कंपनियां फसल उठाने से पीछे हट गई हैं। ऐसे में किसान पूरी तरह बेसहारा हो गया है। वहीं, जालंधर के बड़े आलू उत्पादकों का कहना है कि इस बार बंगाल, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों से बीज खरीदने वाले व्यापारी भी नहीं पहुँच रहे हैं, जिससे बाजार में मांग पूरी तरह ठप है।

बड़े बनाम छोटे किसान: कोल्ड स्टोर का सहारा

इस संकट में छोटे और बड़े किसानों के बीच की खाई भी साफ नजर आ रही है:

बड़े किसान: आर्थिक रूप से सक्षम किसान फसल को सस्ते में बेचने के बजाय कोल्ड स्टोर में रखवा रहे हैं, इस उम्मीद में कि जून-जुलाई तक कीमतें बेहतर होंगी।

छोटे किसान: इनके पास न तो कोल्ड स्टोर का किराया भरने के पैसे हैं और न ही फसल को संभालकर रखने की व्यवस्था। कई गांवों में तो मुनादी करवाई जा रही है कि जिसे आलू चाहिए, वह खेत से मुफ्त ले जाए।

हरियाणा की 'भावांतर योजना' की उठ रही मांग

पंजाब के किसानों और राजनीतिक गलियारों में अब हरियाणा की 'भावांतर भरपाई योजना' की तर्ज पर मदद की मांग तेज हो गई है।

हरियाणा मॉडल: वहाँ आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹6 प्रति किलो तय है। यदि बाजार में दाम कम मिलते हैं, तो सरकार अंतर की राशि सीधे किसान के खाते में डाल देती है।

पंजाब की स्थिति: यहाँ ऐसी कोई योजना न होने के कारण किसान पूरी तरह बाजार के भरोसे है। पूर्व मंत्री राणा गुरजीत सिंह ने विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया है, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।

संकट का सारांश: एक नज़र में

समस्याप्रभाव
बाजार भाव₹2 से ₹3 प्रति किलो
उत्पादन लागत₹4 से ₹5 प्रति किलो (औसतन)
बाहरी मांगअन्य राज्यों के व्यापारियों की बेरुखी
मुख्य मांगहरियाणा की तर्ज पर 'भावांतर योजना' लागू हो

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