वाशिंगटन/तेहरान | अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले चार हफ्तों से जारी भीषण संघर्ष अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। युद्ध की विभीषिका के बीच अब पर्दे के पीछे से कूटनीति के मोहरे चले जा रहे हैं। वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका इस युद्ध को रोकने के लिए पाकिस्तान और तुर्किए का सहारा ले रहा है, जो ईरान के साथ संवाद के गुप्त सेतु (Backchannel) के रूप में काम कर रहे हैं।
मध्यस्थ की भूमिका में पाकिस्तान और तुर्किए
रॉयटर्स की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने पाकिस्तान और तुर्किए के जरिए ईरान को एक अहम प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव को कम करना है।
विकल्प: ईरान के सामने प्रस्ताव रखा गया है कि वह शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान या तुर्किए में से किसी एक स्थान का चयन करे।
तुर्किए की सक्रियता: तुर्किए ने भी युद्धविराम की दिशा में हाथ बढ़ाते हुए ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए प्रोत्साहित किया है।
ईरान का दोहरा रुख: सार्वजनिक इनकार, निजी विचार
ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि तेहरान इन कूटनीतिक प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार कर सकता है। हालांकि, ईरान की सार्वजनिक स्थिति अभी भी सख्त बनी हुई है:
ट्रंप प्रशासन से दूरी: ईरान आधिकारिक तौर पर यह कहता रहा है कि वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।
कूटनीतिक खिड़की: बावजूद इसके, पर्दे के पीछे चल रही बातचीत यह संकेत देती है कि ईरान भी युद्ध की लंबी खिंचती मार से राहत चाहता है और कूटनीतिक रास्तों को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता।
चार हफ्तों के युद्ध का वैश्विक असर
एक महीने से जारी इस संघर्ष ने न केवल मिडिल ईस्ट की स्थिरता को हिला दिया है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर भी बुरा असर डाला है।
"यह युद्ध अब केवल क्षेत्रीय नहीं रहा। कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक सुरक्षा अब इन कूटनीतिक वार्ताओं की सफलता पर टिकी हैं।" — वैश्विक विश्लेषक
निष्कर्ष: क्या सफल होगी यह 'गुप्त' कूटनीति?
जहाँ एक ओर इजरायल और ईरान के बीच सैन्य टकराव जारी है, वहीं पाकिस्तान और तुर्किए द्वारा निभाई जा रही 'गुप्तचर' या मध्यस्थ की भूमिका इस युद्ध के भविष्य को तय कर सकती है। यदि ईरान किसी एक स्थान (इस्लामाबाद या अंकारा) को वार्ता के लिए चुनता है, तो यह इस दशक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत साबित हो सकती है।