बंगाल चुनाव में 'तीसरा मोर्चा' सक्रिय: ओवैसी और हुमायूँ कबीर के गठबंधन से मचा हड़कंप, क्या बिगड़ेगा ममता का समीकरण?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा है और इसी बीच एक नए सियासी गठबंधन ने राज्य के चुनावी गणित को पूरी तरह उलझा दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के निलंबित विधायक हुमायूँ कबीर की पार्टी 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) और असदउद्दीन ओवैसी की 'एआईएमआईएम' (AIMIM) ने औपचारिक रूप से हाथ मिला लिया है। इस गठबंधन के ऐलान के बाद से ही बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोटों के बिखराव को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

26 Mar 2026  |  79

 

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा है और इसी बीच एक नए सियासी गठबंधन ने राज्य के चुनावी गणित को पूरी तरह उलझा दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के निलंबित विधायक हुमायूँ कबीर की पार्टी 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) और असदउद्दीन ओवैसी की 'एआईएमआईएम' (AIMIM) ने औपचारिक रूप से हाथ मिला लिया है। इस गठबंधन के ऐलान के बाद से ही बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोटों के बिखराव को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

182 सीटों पर ताल ठोकने की तैयारी

कोलकाता में आयोजित एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में हुमायूँ कबीर ने घोषणा की कि उनका गठबंधन राज्य की 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। हालांकि, AIMIM को दी जाने वाली सीटों का खुलासा अभी नहीं किया गया है, लेकिन दोनों नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल 'वोट काटने' के लिए नहीं, बल्कि 'मुस्लिम मुख्यमंत्री' के एजेंडे के साथ मैदान में उतर रहे हैं।

ममता का 'मजबूत किला' खतरे में?

पिछले डेढ़ दशक से पश्चिम बंगाल का मुस्लिम मतदाता ममता बनर्जी का सबसे सुरक्षित वोट बैंक रहा है। इसे बचाए रखने के लिए ममता ने इस बार 47 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया है, जो पिछली बार से 5 अधिक हैं। लेकिन अब चुनौती चौतरफा है:

AJUP-AIMIM गठबंधन: बिहार के सीमांचल से सटे उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर में ओवैसी का प्रभाव ममता के लिए सिरदर्द बन सकता है।

इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF): नौशाद सिद्दीकी की पार्टी भी दक्षिण बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पैठ बना रही है।

कांग्रेस-वाम मोर्चा: यह गठबंधन भी अपने खोए हुए मुस्लिम जनाधार को वापस पाने की पुरजोर कोशिश में है।

क्या भाजपा को मिलेगा 'वॉकओवर'?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मुस्लिम वोटों में मामूली सा भी बिखराव होता है, तो इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिल सकता है। हुमायूँ कबीर द्वारा 'बाबरी मस्जिद' की तर्ज पर नींव रखने और 'मुस्लिम मुख्यमंत्री' की मांग करने से ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है, जो चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकती है।

आंकड़ों की जुबानी: क्यों अहम है मुस्लिम वोट?

बंगाल की सत्ता का रास्ता मुस्लिम बहुल जिलों से होकर गुजरता है:

निर्णायक सीटें: कुल 294 सीटों में से करीब 100-110 सीटों पर मुस्लिम मतदाता हार-जीत तय करते हैं।

जनसांख्यिकी: राज्य की लगभग 30% आबादी मुस्लिम है।

प्रमुख जिले: मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 50% से अधिक है, जहाँ यह नया गठबंधन सेंध लगाने की तैयारी में है।

सियासी गलियारों की चर्चा: ओवैसी ने ममता सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि तृणमूल ने केवल वोट लिए हैं, लेकिन समुदाय के लिए काम नहीं किया। अब देखना यह है कि क्या बंगाल का मुस्लिम मतदाता 'दीदी' के भरोसे पर कायम रहता है या फिर ओवैसी-हुमायूँ की जोड़ी कोई नया करिश्मा कर दिखाएगी।

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