उत्तर बंगाल का 'सियासी रण': 16 आरक्षित सीटों पर टिकी भाजपा-तृणमूल की किस्मत, आदिवासी वोट बैंक बनेगा 'किंगमेकर'

इस बार उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटों में से 16 सीटें पर मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधा और कड़ा दिखाई दे रहा है।

28 Mar 2026  |  60

 

सिलिगुड़ी/जलपाईगुड़ी: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के मद्देनजर उत्तर बंगाल की राजनीति गरमा गई है। यहाँ की 54 विधानसभा सीटों में से 16 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं, जो किसी भी दल की सत्ता की राह तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इस बार मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधा और कड़ा दिखाई दे रहा है।

TMC की 'सेंधमारी' रणनीति: कद्दावर चेहरों पर दांव

पिछले चुनाव में तराई और डुवार्स के आदिवासी बहुल इलाकों में पिछड़ने के बाद, इस बार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। भाजपा के 'दुर्ग' को ढहाने के लिए तृणमूल ने स्थानीय और प्रभावशाली आदिवासी नेताओं को मैदान में उतारा है:

माल (जलपाईगुड़ी): जनजाति कल्याण मंत्री बुलूचिक बड़ाइक पर फिर भरोसा।

नागराकाटा: कद्दावर नेता संजय कुजूर को टिकट।

अलीपुरद्वार: मदारीहाट से जयप्रकाश टोप्पो, कुमारग्राम से राजीव तिर्की और कालचीनी से चाय श्रमिक नेता वीरेंद्र बाड़ा चुनावी रण में।

फांसीदेवा (दार्जिलिंग): महिला कार्ड खेलते हुए पंचायत समिति सभापति रीना टोप्पो एक्का को उम्मीदवार बनाया गया है।

भाजपा का प्रदर्शन और मौजूदा चुनौतियां

बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उत्तर बंगाल भाजपा का गढ़ रहा है। अलीपुरद्वार से मनोज तिग्गा के सांसद बनने और नागराकाटा, कालचीनी व कुमारग्राम जैसी सीटों पर भाजपा विधायकों की जीत ने पार्टी की पकड़ मजबूत की थी। हालांकि, हालिया मदारीहाट उपचुनाव में तृणमूल की जीत ने भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। अब चुनौती इस जनाधार को बचाए रखने की है।

प्रमुख मुद्दे: क्या तय करेगा आदिवासियों का वोट?

उत्तर बंगाल के चाय बागानों और आदिवासी गांवों में कुछ बुनियादी समस्याएं चुनाव का रुख मोड़ने की क्षमता रखती हैं:

मुद्देविस्तार
चाय बागान श्रमिकन्यूनतम मजदूरी तय न होना, वेतन और बोनस में देरी।
बुनियादी सुविधाएंशिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी।
जमीन अधिकारपट्टा और जमीन के कानूनी मालिकाना हक की पुरानी मांग।
सामाजिक सुरक्षाभविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी के बकाये का मुद्दा।

निष्कर्ष: तराई और डुवार्स में कांटे की टक्कर

डुवार्स इलाके के कई बागानों में महीनों का वेतन बकाया है, जिसे लेकर श्रमिकों में रोष है। जहाँ भाजपा केंद्र सरकार की योजनाओं के दम पर वोट मांग रही है, वहीं तृणमूल राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और नए आदिवासी चेहरों के माध्यम से वापसी की कोशिश में है। 2026 की यह जंग उत्तर बंगाल की 16 आरक्षित सीटों के इर्द-गिर्द ही सिमटती दिख रही है।

अन्य खबरें