मुंबई | बिज़नेस डेस्क: साल 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड बढ़त बनाने वाला सोना अब निवेशकों को डरा रहा है। वैश्विक बाजारों में सोने की कीमतें अपने ऑल-टाइम हाई से 20% तक लुढ़क चुकी हैं, जिसे तकनीकी भाषा में 'बेयर मार्केट' (Bear Market) का संकेत माना जाता है। मजबूत डॉलर और ऊँची ब्याज दरों के दोहरे वार ने पीली धातु की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।
$5,602 से $4,495 तक का गोता
जनवरी 2026 में सोना $5,602 के ऐतिहासिक शिखर पर पहुँच गया था। अक्टूबर 2022 से शुरू हुई इस रैली में सोने ने लगभग 275% का रिटर्न दिया। लेकिन हालिया हफ्तों में बिकवाली के दबाव के चलते कीमतें गिरकर $4,495 के करीब आ गई हैं।
इतिहास की गवाही: क्या और बड़ी गिरावट बाकी है?
बाजार विशेषज्ञ मार्क ट्वेन की उस बात को याद कर रहे हैं कि "इतिहास खुद को दोहराता नहीं, पर मेल जरूर खाता है।" पिछले दशकों का डेटा बताता है कि बड़ी तेजी के बाद सोने में हमेशा भारी करेक्शन आया है:
1974-76: 353% की तेजी के बाद 43% की गिरावट आई थी।
1980 का दशक: 541% उछाल के बाद कीमतें 52% तक गिर गई थीं।
2011-2015: लंबी तेजी के बाद बाजार 42% नीचे आया था।
यदि इतिहास खुद को दोहराता है, तो विशेषज्ञों का अनुमान है कि सोना अपने पीक से 50% तक गिरकर $2,800 से $3,000 के स्तर को छू सकता है। फिलहाल $3,600 को एक मजबूत सपोर्ट लेवल माना जा रहा है।
क्यों लग रहा है कीमतों को 'करंट'?
सोने पर दबाव के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
ईरान युद्ध का असर: युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे वैश्विक महंगाई में इजाफा हुआ है।
मजबूत डॉलर: असुरक्षा के माहौल में डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ है, जिससे अन्य मुद्राओं के लिए सोना महंगा हो गया है।
ऊँची ब्याज दरें: चूंकि सोना रखने पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए ऊँची ब्याज दरों के दौर में निवेशक फिक्स्ड डिपॉजिट या बॉन्ड्स की ओर रुख कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या है रणनीति?
बाजार के जानकारों का मानना है कि शॉर्ट टर्म में अस्थिरता बनी रहेगी। हालांकि, सेंट्रल बैंकों द्वारा की जा रही सोने की खरीदारी और भू-राजनीतिक तनाव लंबी अवधि में इसे सहारा दे सकते हैं।
विशेषज्ञ सलाह: मौजूदा माहौल में शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग जोखिम भरी हो सकती है। अपने कुल पोर्टफोलियो का केवल 10-15% ही सोने में रखें और कम से कम 3-5 साल के नजरिए से निवेश करें।