इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: मार्च 2026 के अंत में जब मध्य पूर्व की आग भीषण रूप ले चुकी है और अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमलों को चार हफ्ते बीत चुके हैं, तब पाकिस्तान अचानक एक 'पीस ब्रोकर' (मध्यस्थ) के रूप में उभरा है। जो देश खुद अफगानिस्तान के साथ सीमा पर युद्ध जैसी स्थिति में है और घरेलू मोर्चे पर अस्थिर है, वह दुनिया के सबसे बड़े संघर्ष को सुलझाने का दावा कर रहा है। आखिर पाकिस्तान की इस 'डिप्लोमैटिक दलाली' के पीछे असली खिलाड़ी कौन है?
15-पॉइंट सीजफायर प्लान और ट्रंप का समर्थन
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच एक सेतु बनने की कोशिश करते हुए 15-सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव पेश किया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार ने इस्लामाबाद में उच्च स्तरीय वार्ता की पेशकश की है। चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद पाकिस्तानी पीएम की पोस्ट को शेयर कर इस भूमिका को हवा दी है।
किसके दम पर हो रहा है यह खेल?
पाकिस्तान की यह अचानक जागी 'न्यूट्रल डिप्लोमेसी' दरअसल उसके दो आकाओं—चीन और अमेरिका—को एक साथ साधने की सोची-समझी रणनीति है:
चीन का 'प्रॉक्सी' कार्ड: 2023 में सऊदी-ईरान सुलह कराने वाला चीन अब पाकिस्तान को मध्य पूर्व में अपना 'प्रॉक्सी' बनाकर इस्तेमाल कर रहा है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी के समर्थन के साथ पाकिस्तान चीन की 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' का हिस्सा बनकर खेल रहा है। चीन बिना मैदान में उतरे पाकिस्तान के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
अमेरिका का 'बैक-चैनल': ट्रंप प्रशासन के साथ हाल के महीनों में पाकिस्तान के रिश्तों में गर्माहट आई है। आर्मी चीफ आसिम मुनीर ट्रंप के भरोसेमंद बनते दिख रहे हैं। अमेरिका सीधे ईरान से बात करने की झिझक मिटाने के लिए पाकिस्तान के '15-पॉइंट प्लान' का इस्तेमाल कर रहा है। बदले में पाकिस्तान को IMF बेलआउट और सैन्य सहायता की उम्मीद है।
असली विजेता कौन: चीन या अमेरिका?
विश्लेषकों का मानना है कि इस खेल में असली विजेता चीन है:
चीन: बिना एक भी गोली चलाए पाकिस्तान को 'मिडिल पावर' बना रहा है। युद्ध रुकने पर चीन को क्रेडिट मिलेगा और युद्ध बढ़ने पर ईरान पर उसका नियंत्रण और गहरा होगा।
अमेरिका: ट्रंप को तत्काल 'शांति' की एक जीत चाहिए, जिसे वे पाकिस्तान के जरिए बिना चेहरा खराब किए हासिल करना चाहते हैं।
पाकिस्तान: वह दोनों तरफ से कर्ज, हथियार और भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की पुरानी कला का प्रदर्शन कर रहा है।
विडंबना: एक तरफ पाकिस्तान 'शांतिदूत' बन रहा है, तो दूसरी तरफ उसी दौरान उसने अफगानिस्तान में अस्पतालों पर बमबारी की है। यह दोहरा चेहरा दुनिया के सामने है।
भारत के लिए क्या है चुनौती?
इस घटनाक्रम ने भारत के लिए कूटनीतिक स्पेस कम कर दिया है:
गठजोड़ का खतरा: पाकिस्तान-चीन गठजोड़ अब गल्फ देशों (सऊदी, UAE) के साथ डिफेंस पैक्ट के जरिए और मजबूत हो रहा है।
आर्थिक चोट: ईरान युद्ध से भारत का तेल आयात और चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो रहे हैं।
देरी से प्रतिक्रिया: भारत की 'पर्सनलाइज्ड डिप्लोमेसी' के मुकाबले पाकिस्तान की 'बैक-चैनल नीति' फिलहाल उसे इस क्षेत्र में प्रासंगिक बनाए हुए है।