काठमांडू। नेपाल की राजनीति में 'Gen-Z' आंदोलन की लहर पर सवार होकर सत्ता के शिखर तक पहुंचे प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) ने पद संभालते ही ऐसे कड़े फैसले लिए हैं, जिन्होंने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की गिरफ्तारी और शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक छात्र संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के सरकार के निर्णयों को 'न्याय' और 'राजनीतिक प्रतिशोध' के तराजू में तौला जा रहा है।
केपी ओली की गिरफ्तारी: न्याय या राजनीतिक बदला?
बालेन सरकार की पहली कैबिनेट मीटिंग के बाद पुलिस ने पूर्व पीएम केपी ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को हिरासत में ले लिया।
आधार: यह कार्रवाई गौरी बहादुर कार्की कमीशन की रिपोर्ट पर की गई है।
आरोप: सितंबर 2025 में हुए Gen-Z आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों की फायरिंग में 78 प्रदर्शनकारियों की मौत के लिए तत्कालीन ओली सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है।
प्रतिक्रिया: ओली की पार्टी ने इसे 'राजनीतिक प्रतिशोध' बताते हुए नेपाल के सभी 77 जिलों में आंदोलन का ऐलान किया है। समर्थकों और पुलिस के बीच कई जगह हिंसक टकराव की खबरें भी सामने आ रही हैं।
कैंपस से राजनीति बेदखल: युवा समर्थकों में हैरानी
बालेन शाह ने शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए एक '100 सूत्रीय कार्य योजना' पेश की है, जिसके तहत स्कूलों और कॉलेजों में राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
तर्क: सरकार का मानना है कि शिक्षण संस्थानों को राजनीति से मुक्त करना अनिवार्य है।
चिंता: विडंबना यह है कि जिस छात्र शक्ति और डिजिटल नेटवर्क ने बालेन को सत्ता तक पहुंचाया, अब उसी के संगठित स्वरूप पर प्रहार किया गया है। जानकारों का मानना है कि इससे भविष्य के राजनीतिक नेतृत्व की 'नर्सरी' खत्म हो सकती है।
बालेन शाह के सामने 'दोहरी चुनौती'
37 वर्षीय गृहमंत्री सूडान गुरुंग और पीएम बालेन शाह के लिए आने वाले दिन अग्निपरीक्षा के समान होंगे। उनके सामने मुख्य चुनौतियाँ हैं:
संस्थागत स्थिरता बनाम जन-अपेक्षाएं: क्या सरकार केवल पुराने नेताओं को जेल भेजकर समर्थकों को संतुष्ट करेगी या देश में दीर्घकालिक प्रशासनिक स्थिरता लाएगी?
समर्थकों का असंतोष: छात्र संगठनों पर बैन से वह युवा पीढ़ी नाराज हो सकती है, जो अभिव्यक्ति की आजादी को सर्वोपरि मानती है।
विपक्ष का ध्रुवीकरण: ओली की गिरफ्तारी ने बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट होने का एक ठोस मुद्दा दे दिया है।
निष्कर्ष: नेपाल की राजनीति में न्याय और प्रतिशोध के बीच की रेखा बेहद धुंधली हो गई है। बालेन शाह एक 'सख्त प्रशासक' की छवि गढ़ने की कोशिश में हैं, लेकिन इन साहसी फैसलों की राजनीतिक कीमत उन्हें और उनकी नई सरकार को चुकानी पड़ सकती है।