लोकसभा में IBC संशोधन विधेयक 2025 पारित: 14 दिनों में स्वीकार होंगे दिवालियापन के आवेदन; मुकदमों की देरी पर कसेगा लगाम

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की सेहत सुधारने और कॉर्पोरेट गवर्नेंस को मजबूत करने की दिशा में सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। लोकसभा ने सोमवार को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 को अपनी मंजूरी दे दी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए इस विधेयक में दिवालियापन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए 12 प्रमुख संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं।

30 Mar 2026  |  65

 

नई दिल्ली। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की सेहत सुधारने और कॉर्पोरेट गवर्नेंस को मजबूत करने की दिशा में सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। लोकसभा ने सोमवार को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 को अपनी मंजूरी दे दी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए इस विधेयक में दिवालियापन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए 12 प्रमुख संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं।

संशोधन के मुख्य बिंदु: समय सीमा और अनुशासन

इस नए विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा दिवालियापन के आवेदनों को स्वीकार करने की प्रक्रिया को गति देना है:

अनिवार्य समय सीमा: अब किसी कंपनी के 'डिफ़ॉल्ट' (कर्ज न चुका पाना) साबित होने के बाद, दिवालियापन के आवेदन को स्वीकार करने के लिए 14 दिनों की अनिवार्य समय सीमा तय की गई है।

मुकदमेबाजी पर नियंत्रण: वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि समाधान में देरी का सबसे बड़ा कारण लंबी मुकदमेबाजी है। नए विधेयक में प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े दंड (Penalty) का प्रावधान किया गया है।

IBC: 'ऋण वसूली' नहीं, 'व्यवसाय बचाने' का तंत्र

सदन में चर्चा के दौरान वित्त मंत्री सीतारमण ने इस कानून के मूल उद्देश्य को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया:

"IBC (आईबीसी) का उद्देश्य कभी भी केवल बकाया राशि की वसूली करना या ऋण वसूली तंत्र के रूप में कार्य करना नहीं था। इसका असली मकसद व्यवहार्य व्यवसायों को बचाना, उद्यम के मूल्य को संरक्षित करना और वित्तीय संकट का समाधान करना है।"

2016 से अब तक का सफर और उपलब्धियां

वित्त मंत्री ने 2016 में लागू हुई इस संहिता के सकारात्मक प्रभावों को रेखांकित किया:

बैंकिंग स्वास्थ्य: आईबीसी ने भारतीय बैंकों की एनपीए (NPA) समस्या को सुलझाने और उनके समग्र स्वास्थ्य में सुधार करने में प्रमुख भूमिका निभाई है।

क्रेडिट प्रोफाइल: इस ढांचे ने कंपनियों को बेहतर क्रेडिट रेटिंग प्राप्त करने और ऋण अनुशासन (Credit Discipline) विकसित करने में मदद की है।

कॉर्पोरेट गवर्नेंस: समाधान प्रक्रिया से बाहर आने वाली कंपनियों के प्रदर्शन और उनके प्रबंधन के तौर-तरीकों में काफी सुधार देखा गया है।

निष्कर्ष

27 मार्च को हुई विस्तृत चर्चा और चयन समिति के सुझावों के बाद पारित यह विधेयक अब राज्यसभा में भेजा जाएगा। यदि यह कानून बनता है, तो यह 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (Ease of Doing Business) की दिशा में भारत की रैंकिंग को और बेहतर करेगा और निवेशकों का भरोसा बढ़ाएगा।

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