नई दिल्ली। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के खिलाफ 1980 के दशक के मतदाता सूची विवाद को लेकर दायर याचिका पर सोमवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सोनिया गांधी ने भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पहले ही 'धोखाधड़ी' के जरिए अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाया था। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 अप्रैल की तारीख तय की है।
अदालत की सख्त टिप्पणी: "आप दायरा बढ़ा रहे हैं"
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग की, तो अदालत ने मामले की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए:
समय का अंतराल: कोर्ट ने कहा, "यह मामला लगभग आधी सदी (50 साल) पुराना है। आप अब किसकी जांच कराना चाहते हैं? आप इस मामले का दायरा अनावश्यक रूप से बढ़ा रहे हैं।"
तथ्यों की कमी: अदालत ने टिप्पणी की कि वर्तमान में याचिकाकर्ता केवल नाम जोड़ने और हटाने की परिस्थितियों की जानकारी दे रहा है, जो किसी बड़ी साजिश को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं दिखती।
क्या हैं याचिकाकर्ता के आरोप?
वकील विकास त्रिपाठी द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित दावे किए गए हैं:
नागरिकता से पहले नाम: सोनिया गांधी ने अप्रैल 1983 में भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनका नाम कथित तौर पर 1980 की मतदाता सूची में पहले से मौजूद था।
जालसाजी का दावा: याचिकाकर्ता का कहना है कि एक विदेशी नागरिक का नाम बिना किसी फर्जीवाड़े या जाली दस्तावेजों के सूची में नहीं जुड़ सकता, इसलिए इसकी गहन जांच जरूरी है।
मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती: यह याचिका सितंबर 2025 के उस आदेश के खिलाफ है जिसमें मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पुलिस जांच की मांग को खारिज कर दिया था।
सोनिया गांधी के पक्ष की दलील
सोनिया गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता चीमा ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया:
तार्किक आधार: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि क्या इस बात का कोई ठोस सबूत है कि आवेदन करने से पहले वह नागरिक नहीं थीं?
अदालत का समर्थन: कोर्ट ने भी याचिकाकर्ता की मांग को चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ एक "फिशिंग इंक्वायरी" (बिना ठोस आधार के सबूत खोजने की कोशिश) करार दिया।
मामले का ऐतिहासिक संदर्भ
दस्तावेजों के अनुसार, विवाद सामने आने के बाद 1982 में सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था। इसके बाद 1983 में उन्हें विधिवत भारतीय नागरिकता प्राप्त हुई थी। अब याचिकाकर्ता का तर्क है कि 1980 में नाम जुड़ना एक आपराधिक कृत्य था जिसकी जांच होनी चाहिए।