नई दिल्ली: लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कांग्रेस सांसदों ने पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और उससे उत्पन्न एलपीजी (LPG), कच्चे तेल (Crude Oil) और उर्वरकों (Fertilizers) के संकट पर चर्चा की मांग को लेकर भारी हंगामा किया। विपक्ष का तर्क है कि यह संकट केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सीधे तौर पर भारत की आम जनता की जेब और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है।
विपक्ष की मांग: "राजनीति नहीं, समाधान चाहिए"
कांग्रेस की ओर से इस मोर्चे की कमान मनीष तिवारी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने संभाली:
मनीष तिवारी का तर्क: उन्होंने व्यापार सलाहकार समिति (BAC) की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि उर्वरक और ईंधन संकट पर सदन में चर्चा अनिवार्य है, ताकि देश को स्पष्टता मिल सके।
प्रियंका गांधी का बयान: लोकसभा परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा, "यह मुद्दा राजनीति से ऊपर है। आने वाले दिनों में संकट और गहरा सकता है। संसद में चर्चा इसलिए जरूरी है ताकि विपक्ष सुझाव दे सके और मिलकर समाधान निकाला जा सके।"
सरकार का पक्ष: "संवाद के लिए तैयार, पर बयान दिए जा चुके हैं"
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीर है और विपक्ष के साथ निरंतर संपर्क में है:
पहले ही स्पष्टीकरण: सरकार ने जोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी दोनों सदनों में विस्तृत बयान दे चुके हैं।
सर्वदलीय बैठक: रिजिजू ने याद दिलाया कि सरकार ने हाल ही में सभी दलों की चिंताओं को दूर करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। उन्होंने कहा, "संकट के समय हम सब एक हैं, इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए।"
चर्चा क्यों है जरूरी? (मुख्य आर्थिक चिंताएं)
संसद में हंगामे के पीछे मुख्य कारण वे प्रभाव हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे हैं:
कच्चा तेल (Crude Oil): युद्ध के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें $115 प्रति बैरल के पास पहुँच गई हैं, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का खतरा है।
एलपीजी संकट: आपूर्ति बाधित होने से घरेलू गैस की बुकिंग और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है।
उर्वरक (Fertilizers): रबी सीजन के दौरान खाड़ी देशों से उर्वरकों की आपूर्ति रुकने से कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर सीधा असर पड़ सकता है।
सदन की स्थिति
विपक्ष के अड़ने और नारेबाजी के कारण लोकसभा की कार्यवाही को संक्षिप्त रूप से स्थगित करना पड़ा। हालांकि सरकार ने चर्चा से पूरी तरह इनकार नहीं किया है, लेकिन उनका मानना है कि वर्तमान में दिए गए आधिकारिक बयान पर्याप्त हैं।
निष्कर्ष: पश्चिम एशिया का संकट अब केवल सरहदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय संसद के गलियारों में एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा बन गया है। विपक्ष चाहता है कि सरकार एक ठोस 'एक्शन प्लान' साझा करे, जबकि सरकार का फोकस फिलहाल कूटनीतिक स्थिरता और निरंतर निगरानी पर है।