प्रोजेक्ट चित्तूर: खेती और बिजली उत्पादन का अनोखा संगम, किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में बड़ा कदम

कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव लाते हुए 'एट्रिया ग्रुप' (Atria Group) ने चित्तूर जिले के थिरुमाला राजू पुरम (पलयम) में 'प्रोजेक्ट चित्तूर' की शुरुआत की है।

07 Apr 2026  |  39

 

चित्तूर (आंध्र प्रदेश): कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव लाते हुए 'एट्रिया ग्रुप' (Atria Group) ने चित्तूर जिले के थिरुमाला राजू पुरम (पलयम) में 'प्रोजेक्ट चित्तूर' की शुरुआत की है। यह परियोजना 'एग्रीवोल्टाइक' (Agrivoltaic) तकनीक पर आधारित है, जो यह दर्शाती है कि कैसे एक ही जमीन के टुकड़े पर फसल उगाने के साथ-साथ सौर ऊर्जा का उत्पादन भी किया जा सकता है।

क्या है एग्रीवोल्टाइक सिस्टम?

इस तकनीक के तहत, सक्रिय कृषि भूमि के ऊपर ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं। इससे जमीन का दोहरा उपयोग सुनिश्चित होता है:

नीचे खेती: ऊंचे पैनलों के नीचे किसान अपनी नियमित फसलें उगाना जारी रखते हैं।

ऊपर बिजली: पैनल सूर्य की रोशनी से स्वच्छ ऊर्जा (Solar Power) पैदा करते हैं।

किसानों के लिए इसके फायदे

'प्रोजेक्ट चित्तूर' केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण विकास का एक संपूर्ण मॉडल है:

फसल सुरक्षा: ऊंचे सोलर पैनल फसलों को आंशिक छाया प्रदान करते हैं। इससे तेज गर्मी के महीनों में मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण (Evaporation) कम होता है और फसलों पर 'हीट स्ट्रेस' का प्रभाव नहीं पड़ता।

लागत में कमी: उत्पादित बिजली का उपयोग कृषि क्लस्टरों में साझा बुनियादी ढांचे को चलाने के लिए किया जाएगा, जैसे:

सिंचाई पंप और बोरवेल।

कोल्ड स्टोरेज इकाइयां और ड्रायर।

पैकहाउस और अन्य प्रसंस्करण (Processing) सुविधाएं।

अतिरिक्त आय: एट्रिया ग्रुप के चेयरमैन सुंदर राजू के अनुसार, ग्रिड पर निर्भरता कम होने से परिचालन लागत घटेगी। इसके अलावा, ब्लॉक स्तर पर पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली को बेचकर किसान आय का एक नया जरिया बना सकेंगे।

परियोजना के मुख्य आंकड़े

विवरणजानकारी
क्षेत्रफल प्रति ब्लॉक1 से 1.5 एकड़
सौर क्षमतालगभग 300 kW (किलोवाट)
मुख्य उद्देश्यनिर्बाध खेती और बिजली उत्पादन
लोकेशनथिरुमाला राजू पुरम, चित्तूर जिला

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भविष्य की राह

एट्रिया ग्रुप का यह मॉडल साबित करता है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक खेती के मेल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सकती है। यह न केवल किसानों को आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल 'क्लीन एनर्जी' को बढ़ावा देने में भी मील का पत्थर साबित होगा।

विशेषज्ञों का मानना है: यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो भारत के अन्य राज्यों में भी इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है, जिससे कृषि क्षेत्र में ऊर्जा संकट का समाधान होगा।

क्या आपको लगता है कि भारत के अन्य सूखाग्रस्त क्षेत्रों में एग्रीवोल्टाइक प्रणाली को अनिवार्य कर देना चाहिए, या छोटे किसानों के लिए इसके कार्यान्वयन में चुनौतियां अधिक होंगी?

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