लिफ्ट और बेसमेंट में जाते ही क्यों 'डेड' हो जाता है मोबाइल सिग्नल? जानें इसके पीछे का दिलचस्प विज्ञान

घर हो या दफ्तर, हम हर वक्त हाई-स्पीड नेटवर्क से जुड़े रहना चाहते हैं। लेकिन एक जगह ऐसी है जहाँ पहुँचते ही हमारा स्मार्टफोन 'डिब्बा' बन जाता है—वह है लिफ्ट और बेसमेंट। आखिर हवा में तैरती रेडियो तरंगें कंक्रीट और मेटल के सामने घुटने क्यों टेक देती हैं? आइए समझते हैं इसके पीछे के तकनीकी कारण।

09 Apr 2026  |  37

 

टेक डेस्क। आज के डिजिटल युग में इंटरनेट ऑक्सीजन की तरह जरूरी हो गया है। घर हो या दफ्तर, हम हर वक्त हाई-स्पीड नेटवर्क से जुड़े रहना चाहते हैं। लेकिन एक जगह ऐसी है जहाँ पहुँचते ही हमारा स्मार्टफोन 'डिब्बा' बन जाता है—वह है लिफ्ट और बेसमेंट। आखिर हवा में तैरती रेडियो तरंगें कंक्रीट और मेटल के सामने घुटने क्यों टेक देती हैं? आइए समझते हैं इसके पीछे के तकनीकी कारण।

1. कंक्रीट और लोहे की अभेद्य दीवारें

बेसमेंट और लिफ्ट की संरचना आमतौर पर बेहद मजबूत कंक्रीट की दीवारों से बनी होती है। इन दीवारों के भीतर लोहे की छड़ों (Reinforced Steel) का जाल होता है। मोबाइल नेटवर्क रेडियो वेव्स (Radio Waves) के जरिए काम करता है। जब ये तरंगें इतनी घनी और धातु युक्त दीवारों से टकराती हैं, तो वे उन्हें पार नहीं कर पातीं। कंक्रीट सिग्नल को सोख लेता है और लोहा उन्हें परावर्तित (Reflect) कर देता है, जिससे नेटवर्क अंदर तक नहीं पहुँच पाता।

2. 'फैराडे केज' (Faraday Cage) का प्रभाव

लिफ्ट मूल रूप से धातु (मेटल) से बना एक बंद डिब्बा होती है। विज्ञान की भाषा में यह एक 'फैराडे केज' की तरह काम करती है। फैराडे केज एक ऐसा घेरा होता है जो बाहरी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल को अपने अंदर आने से पूरी तरह रोक देता है। यही कारण है कि जैसे ही लिफ्ट के दरवाजे बंद होते हैं, आपका फोन नेटवर्क टॉवर से पूरी तरह कट जाता है और कॉल ड्रॉप हो जाती है।

3. जमीन के नीचे की गहराई और दूरी

मोबाइल सिग्नल्स 'लाइन ऑफ साइट' और रिफ्लेक्शन पर काम करते हैं। चूंकि बेसमेंट जमीन के नीचे होते हैं, इसलिए मोबाइल टॉवर से आने वाले सिग्नल को वहाँ तक पहुँचने के लिए मिट्टी की कई परतों और इमारतों की नींव से गुजरना पड़ता है। जितनी ज्यादा बाधाएं होंगी, सिग्नल उतना ही कमजोर होता जाएगा।

4. 5G और 4G की तकनीकी सीमा

अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि बेसमेंट में 5G काम नहीं करता लेकिन पुराना 2G फोन चल जाता है। इसके पीछे फ्रीक्वेंसी (Frequency) का खेल है:

हाई फ्रीक्वेंसी (4G/5G): ये तेज इंटरनेट तो देते हैं, लेकिन इनकी भेदन क्षमता (Penetration power) कम होती है। ये दीवारों को पार करने में कमजोर होते हैं।

लो फ्रीक्वेंसी (2G): इनकी तरंगें लंबी होती हैं और ये बाधाओं को पार करने में अधिक सक्षम होती हैं, इसलिए कभी-कभी बेसमेंट में सिर्फ कॉलिंग हो पाती है, डेटा नहीं चलता।

क्या है इस समस्या का समाधान?

तकनीकी रूप से इस चुनौती से निपटने के लिए अब नई इमारतों में खास इंतजाम किए जाते हैं:

सिग्नल बूस्टर (Signal Repeaters): बड़े मॉल और ऑफिस के बेसमेंट में नेटवर्क बूस्टर लगाए जाते हैं जो बाहर के सिग्नल को पकड़कर अंदर डिस्ट्रीब्यूट करते हैं।

Wi-Fi कॉलिंग: अगर बेसमेंट में वाई-फाई की सुविधा है, तो आप फोन के 'Wi-Fi Calling' फीचर को ऑन करके बिना नेटवर्क के भी एचडी कॉलिंग का आनंद ले सकते हैं।

अगली बार जब आप लिफ्ट में फंसे और इंटरनेट बंद हो जाए, तो समझ लीजिएगा कि भौतिक विज्ञान (Physics) अपना काम कर रहा है!

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