नई दिल्ली: पूर्वोत्तर के द्वार असम, दक्षिण के शांत तटों वाले केरलम और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान की प्रक्रिया गुरुवार को उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुई। तीनों क्षेत्रों में मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिससे मतदान का प्रतिशत 2021 के मुकाबले काफी बेहतर रहा। अब सभी की निगाहें 4 मई, 2026 को आने वाले परिणामों पर टिकी हैं।

मतदान के रिकॉर्ड तोड़ आंकड़े
निर्वाचन आयोग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, इस बार वोटिंग पैटर्न में भारी उछाल देखा गया है:
| राज्य/केंद्र शासित प्रदेश | मतदान प्रतिशत (2026) | 2021 का प्रतिशत | मुख्य मुकाबला |
|---|---|---|---|
| पुडुचेरी | 89.20% | 81.70% | NDA बनाम विपक्ष (इंडिया गठबंधन) |
| असम | 85.10% | 82.04% | भाजपा (हिमंत बिस्वा सरमा) बनाम कांग्रेस (गौरव गोगोई) |
| केरलम | 77.50% | 74.06% | LDF (पिनराई विजयन) बनाम UDF बनाम NDA |
पुडुचेरी: रोबोट ने किया स्वागत, बुजुर्गों में दिखा जोश
पुडुचेरी में लोकतंत्र की एक अनूठी तस्वीर देखने को मिली। यहाँ एक मतदान केंद्र पर फूलों के साथ मतदाताओं का स्वागत करने के लिए रोबोट तैनात किया गया था।
यहाँ सुबह से ही लंबी कतारें देखी गईं, जिनमें महिलाओं और बुजुर्गों की भागीदारी उल्लेखनीय रही।
ग्रामीण इलाकों में जबरदस्त चहल-पहल रही, जहाँ लोग स्थानीय मुद्दों और सत्ता परिवर्तन या निरंतरता के आधार पर वोट डालने पहुंचे।
असम: गढ़ बचाने और सत्ता पाने की जंग
असम में 126 सीटों पर मतदान हुआ। यहाँ दलगांव निर्वाचन क्षेत्र ने 94.57% वोटिंग के साथ रिकॉर्ड बनाया।
प्रमुख चेहरे: मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भाजपा की सत्ता बरकरार रखने की कोशिश में हैं, जबकि गौरव गोगोई कांग्रेस की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
जलुकबारी, जोरहाट और गुवाहाटी सेंट्रल जैसी हॉट सीटों पर पूरे देश की नजर है।
केरलम: त्रिकोणीय मुकाबले की आहट
केरलम की 140 सीटों पर शांतिपूर्ण मतदान हुआ। जहाँ पारंपरिक रूप से मुकाबला एलडीएफ और यूडीएफ के बीच रहा है, वहीं इस बार भाजपा ने भी नेमम और त्रिशूर जैसी सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंकी है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन लगातार तीसरी बार सत्ता में आने का इतिहास रचने की उम्मीद कर रहे हैं।
निष्कर्ष: 4 मई का इंतजार
कुल 1899 उम्मीदवारों की राजनीतिक किस्मत अब ईवीएम में बंद हो चुकी है। असम में बहुमत के लिए 64, केरलम में 71 और पुडुचेरी में 16 सीटों की आवश्यकता है। भारी मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है, क्योंकि बढ़ा हुआ मतदान अक्सर सत्ता विरोधी लहर या किसी बड़े वैचारिक बदलाव का संकेत माना जाता है।