लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी हुई अंतिम मतदाता सूची ने राज्य की सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। चुनाव आयोग के इस 'महासफाई अभियान' के बाद प्रदेश में मतदाताओं की संख्या में भारी गिरावट आई है, जो अब 2014 के लोकसभा चुनाव के स्तर से भी नीचे चली गई है। जहाँ पहले राज्य में 15.44 करोड़ वोटर थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 13.39 करोड़ रह गई है।
प्रमुख आंकड़े: एक दशक पीछे लौटा उत्तर प्रदेश
कुल कटौती: लगभग 2.04 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं।
2014 बनाम 2026: वर्तमान मतदाता संख्या 2014 के मुकाबले भी करीब 49 लाख कम है।
प्रति विधानसभा प्रभाव: औसतन हर सीट पर 71,647 वोटरों की कमी आई है।
बीजेपी के गढ़ में सबसे बड़ी सेंध, सपा सीटों पर कम असर
इस पुनरीक्षण के जो रुझान सामने आए हैं, वे सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी के लिए चिंता का विषय बन सकते हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि:
बीजेपी की सीटें निशाने पर: जिन 16 सीटों पर 1 लाख से अधिक वोट कटे हैं, उनमें से 15 सीटें बीजेपी के पास हैं।
अयोध्या और लखनऊ में झटका: अयोध्या विधानसभा में 20% (80,000+) वोट कटे हैं, वहीं डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक की सीट लखनऊ कैंट में रिकॉर्ड 33% (1.24 लाख) वोटों की कटौती हुई है।
विपक्ष की सक्रियता: जानकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता वोट जुड़वाने में अधिक सक्रिय रहे, जबकि बीजेपी के जमीनी संगठन में 'आंतरिक कलह' और 'शिथिलता' देखी गई।
आधी आबादी के वोट पर सबसे ज्यादा कैंची
'नारी वंदन' के दौर में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा महिलाओं का है। सूची से 1.12 करोड़ महिला मतदाताओं के नाम कटे हैं, जबकि पुरुषों की संख्या में 93 लाख की गिरावट आई है। महिला वोटरों का इस स्तर पर कम होना भविष्य की चुनावी रणनीतियों को पूरी तरह बदल सकता है।
शहरी बनाम ग्रामीण और जिलावार स्थिति
शहरों में भारी कटौती: सबसे ज्यादा गिरावट महानगरों और वेस्ट यूपी (NCR) की शहरी सीटों पर देखी गई है, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी का मजबूत आधार रही हैं।
मुस्लिम बहुल जिले स्थिर: संभल, रामपुर और मुरादाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में वोटों की कटौती का प्रतिशत बीजेपी के प्रभाव वाले शहरी जिलों की तुलना में काफी कम रहा है।
राष्ट्रीय तुलना: गुजरात (13.40%) के बाद उत्तर प्रदेश (13.24%) देश का दूसरा ऐसा राज्य है जहाँ सबसे ज्यादा प्रतिशत में नाम काटे गए हैं।
"यह लिस्ट पूरी पारदर्शिता और शुचिता से बनाई गई है। यह अंतिम नहीं है; यदि कोई वैध मतदाता छूट गया है, तो वह अब भी अपना नाम जुड़वा सकता है। इसे किसी दलगत राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए।" — ब्रजेश पाठक, डिप्टी सीएम, उत्तर प्रदेश
SIR टाइमलाइन पर एक नज़र
27 अक्टूबर: पुनरीक्षण कार्यक्रम की घोषणा।
6 जनवरी: ड्राफ्ट लिस्ट का प्रकाशन।
10 अप्रैल: फाइनल वोटर लिस्ट जारी।
निष्कर्ष: विशेषज्ञों का मानना है कि वोटर लिस्ट की इस 'सर्जरी' ने बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। संगठन की सक्रियता और वोटरों के नाम फिर से जुड़वाने की प्रक्रिया अब आने वाले चुनावों में हार-जीत का मुख्य आधार बनेगी।