मुंबई | विशेष संवाददाता भारतीय संगीत के स्वर्णिम युग की अंतिम जीवित कड़ी, सुरों की मल्लिका आशा भोंसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। सात दशकों तक अपनी मखमली आवाज़ से दुनिया को मंत्रमुग्ध करने वाली 'आशा ताई' के जाने से संगीत के एक अध्याय का अंत हो गया है। उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर विलेपार्ले के 'दीनानाथ मंगेशकर नाट्यगृह' का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जो अब उनकी जीवन की अंतिम सार्वजनिक स्मृति बन गया है।
पिता की यादों के बीच अंतिम उपस्थिति
निधन से महज 15 दिन पहले, गिरती सेहत के बावजूद आशा ताई अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के नाम पर बने नाट्यगृह में मराठी नाटक ‘भ्रमाचा भोपला’ देखने पहुंची थीं। लोअर परेल से विले पार्ले तक का डेढ़ घंटे का सफर तय कर वह यहाँ सिर्फ इसलिए आईं क्योंकि इस जगह की ईंट-ईंट में उनके पिता की यादें बसी थीं। सफ़ेद साड़ी और गुलाबी शॉल में लिपटी आशा ताई के चेहरे पर वही चिरपरिचित मुस्कान थी, जिसने दशकों तक करोड़ों दिलों को जीता।
संजय नार्वेकर की प्रशंसक बनकर पहुंची थीं ताई
नाटक के बाद जब उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया, तो उन्होंने अभिनेता संजय नार्वेकर के अभिनय की जमकर सराहना की। उन्होंने बेहद सादगी से एक किस्सा साझा करते हुए बताया:
"मैंने खुद संजय का नंबर ढूंढकर उन्हें फोन किया। संजय घबरा गए कि आशा ताई ने उन्हें क्यों फोन किया है? लेकिन मैंने उनसे कहा कि मैं बस एक प्रशंसक के नाते आपसे मिलना चाहती हूँ और आपका काम देखना चाहती हूँ।"
अधूरा रह गया वो आखिरी वादा
उस शाम मंच से आशा भोंसले ने दर्शकों और कलाकारों से एक वादा किया था, जो अब कभी पूरा नहीं होगा। उन्होंने कहा था कि कई सालों बाद वह घर से बाहर कोई नाटक देखने निकली हैं और उन्हें बहुत आनंद आया है। मुस्कुराते हुए उन्होंने वादा किया था: "अब से मैं अक्सर नाटक देखने आया करूँगी।" किसे पता था कि ‘भ्रमाचा भोपला’ उनका देखा हुआ आखिरी नाटक साबित होगा और प्रशंसकों से किया गया यह वादा एक स्थायी विदाई में बदल जाएगा।
एक युग की सुरीली विदाई
लता दीदी के जाने के बाद आशा ताई मंगेशकर परिवार का सबसे मजबूत स्तंभ थीं। 12,000 से अधिक गानों को अपनी आवाज़ देने वाली इस महान कलाकार ने 'दम मारो दम' के अल्हड़पन से लेकर 'इन आंखों की मस्ती' की नजाकत तक, हर भाव को अमर कर दिया।
आशा भोंसले: एक नज़र में
कुल गाने: 12,000 से अधिक (विभिन्न भाषाओं में)
अंतिम पब्लिक अपीयरेंस: दीनानाथ मंगेशकर नाट्यगृह (15 दिन पहले)
पहचान: वर्सेटाइल गायकी और सात दशकों का लंबा करियर
आज दीनानाथ मंगेशकर थिएटर की वो खाली कुर्सियां और वहां मौजूद हर दर्शक शायद उस आखिरी मुस्कान को याद कर रहा होगा, जिसने जाते-जाते भी जीवन के प्रति उत्साह का संदेश दिया था। आशा ताई अब भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आने वाली कई सदियों तक गूँजती रहेगी।