नई दिल्ली | मुख्य संवाददाता कांग्रेस संसदीय दल (CPP) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लोकसभा सीटों के पुनर्गठन यानी परिसीमन (Delimitation) को लेकर केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। एक प्रमुख समाचार पत्र ('द हिंदू') में लिखे अपने लेख में उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इस पूरी प्रक्रिया को 'अलोकतांत्रिक' और 'संविधान पर हमला' करार दिया है।
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' में संशोधन पर सवाल
सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया कि विपक्ष महिला आरक्षण (33%) के विचार के खिलाफ नहीं है, लेकिन जिस तरह से इसे परिसीमन से जोड़ा जा रहा है, वह चिंताजनक है।
समय पर आपत्ति: उन्होंने 16 से 18 अप्रैल तक बुलाए गए विशेष सत्र में इन संशोधनों को लाने का विरोध किया है।
मानसून सत्र की मांग: गांधी ने आग्रह किया कि सरकार 29 अप्रैल (पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद) एक सर्वदलीय बैठक बुलाए और इन विधेयकों को जुलाई में होने वाले मानसून सत्र में पेश करे।
"कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा..."
सोनिया गांधी ने सरकार की जल्दबाजी पर कटाक्ष करते हुए लिखा:
"अगर सरकार विपक्ष के साथ चर्चा के बाद मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार करे, तो इससे कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा। राजनैतिक व्यवस्था में इतने बड़े बदलावों को बिना सार्वजनिक बहस के जल्दबाजी में थोपने का कोई औचित्य नहीं है।"
विवाद की जड़: परिसीमन और जनगणना
विपक्ष का आरोप है कि सरकार 2027 की आधिकारिक जनगणना की प्रतीक्षा करने के बजाय अनौपचारिक या पुराने आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है।
संभावित बदलाव: नए संशोधनों के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है।
विपक्ष का तर्क: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी आरोप लगाया कि विशेष सत्र का असली मकसद महिला आरक्षण नहीं, बल्कि जाति जनगणना में देरी करना और उसे पटरी से उतारना है।
सोनिया गांधी के मुख्य आरोप: एक नज़र में
| मुख्य बिंदु | सोनिया गांधी का पक्ष |
|---|---|
| प्रक्रिया | पूरी तरह से दोषपूर्ण और अलोकतांत्रिक। |
| संविधान | अनौपचारिक आंकड़ों पर परिसीमन करना संविधान पर हमला है। |
| आरक्षण | असली मुद्दा आरक्षण नहीं, बल्कि उसकी आड़ में होने वाला परिसीमन है। |
| मांग | विशेष सत्र के बजाय मानसून सत्र में चर्चा और सर्वदलीय बैठक। |
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निष्कर्ष: सोनिया गांधी के इस कड़े रुख ने आगामी विशेष सत्र से पहले राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। विपक्ष का मानना है कि बिना जनगणना और जातिगत आंकड़ों के सीटों का बढ़ाना भविष्य के लिए 'खतरनाक' साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि सरकार विपक्ष की इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है।