नई दिल्ली | विधि संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मांग की गई है कि भविष्य के चुनावों में फर्जी मतदान (Duplicate Voting) और 'घोस्ट वोटिंग' को रोकने के लिए मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आइरिस (Iris) बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली अनिवार्य रूप से लागू की जाए।
मौजूदा चुनावों में लागू करना संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिका में की गई मांग को वर्तमान में चल रहे राज्य विधानसभा चुनावों (जैसे पश्चिम बंगाल) के दौरान लागू करना संभव नहीं है। पीठ ने कहा:
"अगले संसदीय चुनावों (लोकसभा) या भविष्य के विधानसभा चुनावों से पहले इस तरह के कदम उठाने की आवश्यकता की जांच की जानी चाहिए। इसलिए, हम इस मुद्दे पर विचार करने के लिए नोटिस जारी कर रहे हैं।"
अश्विनी उपाध्याय की याचिका में मुख्य दलीलें
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस जनहित याचिका (PIL) में चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और शुचिता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
भ्रष्टाचार पर चोट: रिश्वतखोरी, अनुचित प्रभाव और एक ही व्यक्ति द्वारा कई बार वोट डालने जैसी प्रथाएं चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी को प्रभावित कर रही हैं।
तकनीक का उपयोग: मतदान केंद्रों पर मतदाता की पहचान के लिए केवल पहचान पत्र काफी नहीं है; बायोमेट्रिक तकनीक (अंगूठे के निशान और आंखों की पुतलियों का स्कैन) से फर्जीवाड़े को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
नागरिकों का अहित: याचिका में कहा गया है कि 'घोस्ट वोटिंग' (मृत या अनुपस्थित लोगों के नाम पर वोट) से आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का भारी नुकसान हो रहा है।
क्या बदल सकता है चुनावी परिदृश्य?
यदि भविष्य में चुनाव आयोग बायोमेट्रिक प्रणाली को अपनाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ा तकनीकी सुधार होगा:
सटीक पहचान: आधार डेटाबेस के साथ एकीकरण से मतदाता की पहचान 100% सटीक हो जाएगी।
पारदर्शिता: फर्जी वोटिंग की शिकायतों में भारी कमी आएगी।
लागत और ढांचा: हालांकि, पूरे देश के लाखों मतदान केंद्रों पर बायोमेट्रिक मशीनें लगाना केंद्र और चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी वित्तीय और लॉजिस्टिक चुनौती होगी।
अगला कदम
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और कई अन्य राज्यों से इस प्रस्ताव की व्यवहार्यता और कार्यान्वयन पर विस्तृत जवाब मांगा है। अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग के हलफनामे पर टिकी हैं कि क्या भारत 2029 के लोकसभा चुनावों या उससे पहले की विधानसभाओं के लिए इस डिजिटल सुरक्षा कवच के लिए तैयार है।