'आत्मनिर्भर बागवानी' की ओर भारत: विदेशी फलों और मसालों पर निर्भरता घटाने के लिए NAAS ने सुझाया 'एक्शन प्लान'

देश में विदेशी फलों और मसालों का आयात तेजी से बढ़ रहा है। इस 'उत्पादन विरोधाभास' (Production Paradox) को दूर करने और भारत को वैश्विक निर्यात का केंद्र बनाने के लिए नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) ने एक महत्वपूर्ण नीति पत्र जारी किया है।

14 Apr 2026  |  8

 

नई दिल्ली: भारत दुनिया में फलों और सब्जियों के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, लेकिन इसके बावजूद देश में विदेशी फलों और मसालों का आयात तेजी से बढ़ रहा है। इस 'उत्पादन विरोधाभास' (Production Paradox) को दूर करने और भारत को वैश्विक निर्यात का केंद्र बनाने के लिए नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) ने एक महत्वपूर्ण नीति पत्र जारी किया है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट की अध्यक्षता में तैयार इस रिपोर्ट में 'आत्मनिर्भर बागवानी' के लिए कई कड़े कदम उठाने की सिफारिश की गई है।

आयात का बढ़ता ग्राफ: एक बड़ी चुनौती

रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई गई है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद आयात बजट में भारी उछाल आया है:

ताजे फल: पिछले 15 वर्षों में सेब, कीवी, संतरा और चेरी जैसे फलों का आयात बजट 8 गुना बढ़कर ₹28.43 बिलियन (2009-10) से ₹226.64 बिलियन (2023-24) तक पहुँच गया है।

मसाले: काली मिर्च, लौंग और दालचीनी जैसे मसालों का आयात पिछले 5 वर्षों में 18% बढ़ा है, जो अब ₹120.51 बिलियन के पार है।

निर्यात बढ़ाने और आयात घटाने के लिए 'पंचशील' सुझाव

NAAS ने भारतीय बागवानी क्षेत्र के कायाकल्प के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिए हैं:

उन्नत किस्मों का विकास: सेब, अखरोट, हेज़लनट और कीवी जैसी फसलों के लिए हाई-टेक ब्रीडिंग प्रोग्राम और हाइब्रिड किस्मों को बढ़ावा देना।

लॉजिस्टिक्स में सुधार: फलों की लंबी दूरी की खेप के लिए विशेष समुद्री मार्ग प्रोटोकॉल (Sea Route Protocols) विकसित करना, ताकि समय और गुणवत्ता बनी रहे।

ट्रेसेबिलिटी और सुरक्षा: अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप 'ट्रेसेबिलिटी सिस्टम' को मजबूत करना, जिससे खरीदार को उत्पाद के खेत से लेकर बाजार तक के सफर की पूरी जानकारी मिल सके।

सीड हब के रूप में भारत: भारत को सब्जियों (विशेषकर टमाटर, मिर्च और कद्दू वर्गीय) के हाइब्रिड बीजों के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करना और निर्यात नीति को सरल बनाना।

इंडस्ट्री लिंकेज: बागवानी उत्पादों का उपयोग केवल भोजन तक सीमित न रहे, बल्कि फार्मास्युटिकल और कॉस्मेटिक उद्योगों के साथ साझेदारी कर वैल्यू-ऐडेड प्रोडक्ट्स बनाए जाएं।

संगठित विपणन और नए बाजार

NAAS ने ताइवान की तर्ज पर प्रमुख बागवानी क्षेत्रों में प्रोक्योरमेंट और कलेक्शन सेंटर स्थापित करने की वकालत की है। साथ ही, पारंपरिक बाजारों (जैसे मध्य पूर्व और यूरोप) के अलावा नए देशों की खोज करने का सुझाव दिया है ताकि निर्यात जोखिम को कम किया जा सके।

समन्वय के लिए साझा मंच

नीति पत्र में सुझाव दिया गया है कि विभिन्न मंत्रालयों, कमोडिटी बोर्डों (जैसे मसाला बोर्ड, टी बोर्ड), APEDA और कृषि विश्वविद्यालयों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक साझा प्लेटफॉर्म बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: NAAS के अनुसार, यदि पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान को कम किया जाए और किसानों को उन्नत हाइब्रिड किस्मों के साथ समर्थन दिया जाए, तो भारत न केवल अपना आयात बिल कम कर सकता है, बल्कि वैश्विक बागवानी व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को भी कई गुना बढ़ा सकता है।

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