रियाद/वाशिंगटन: मध्य पूर्व में जारी युद्ध और ईरान द्वारा 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) को बंद किए जाने के बाद अब वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मच गया है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि वह ईरान के बंदरगाहों की घेराबंदी करने की योजना को त्याग दे और कूटनीतिक बातचीत की मेज पर वापस लौटे।
वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, रियाद को डर है कि अमेरिका के इस कड़े कदम से ईरान भड़क सकता है और वह जवाबी कार्रवाई के रूप में अन्य महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों को भी ठप कर सकता है।
बाब अल-मंडेब पर मंडराया खतरा
सऊदी अरब की सबसे बड़ी चिंता 'बाब अल-मंडेब' (Bab al-Mandeb) जलडमरूमध्य को लेकर है। हॉर्मुज की घेराबंदी के बाद सऊदी अरब ने रेगिस्तान के रास्ते पाइपलाइन बिछाकर अपने तेल निर्यात को लाल सागर (Red Sea) तक पहुँचाकर बहाल कर लिया था। लेकिन अब खतरा यह है कि यमन में ईरान समर्थित हुती विद्रोही लाल सागर के इस निकास द्वार को भी बंद कर सकते हैं।
ईरान की धमकी: ईरान की समाचार एजेंसी 'तस्नीम' और सर्वोच्च नेता के सलाहकार अली अकबर विलायती ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे बाब अल-मंडेब को भी हॉर्मुज की तरह ही देखते हैं। यदि व्हाइट हाउस ने 'गलती' दोहराई, तो वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को एक इशारे पर रोका जा सकता है।
तेल की कीमतों में आग: $100 के पार पहुँचा भाव
पिछले छह हफ्तों से जारी इस युद्ध ने मध्य पूर्व के दशकों पुराने यथास्थिति को बदल दिया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया का 20% तेल और एलपीजी गुजरता है, पर ईरान की पकड़ ने प्रतिदिन करीब 13 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति रोक दी है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं।
खाड़ी देशों की दुविधा
सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश, जो लंबे समय से ईरान के साथ सीधे टकराव से बचते आए थे, अब एक कठिन स्थिति में हैं:
वे नहीं चाहते कि युद्ध के अंत में ईरान का हॉर्मुज पर पूर्ण नियंत्रण रहे।
लेकिन वे यह भी जानते हैं कि सैन्य घेराबंदी से स्थिति और बिगड़ेगी और उनका आर्थिक आधार तबाह हो सकता है।
व्हाइट हाउस का रुख
दूसरी ओर, व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने कहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप का रुख स्पष्ट है—वे हॉर्मुज को पूरी तरह खुला देखना चाहते हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ईरान अमेरिका या किसी अन्य देश को ब्लैकमेल न कर सके। अमेरिका का दावा है कि उसके खाड़ी सहयोगी इस रणनीति में साथ हैं, लेकिन सऊदी अरब की 'प्रेसिंग' कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
निष्कर्ष: मध्य पूर्व में ऊर्जा बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता अब पूरी दुनिया के सामने उजागर हो गई है। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते हैं, तो दुनिया को एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।