टूट रहा है 'अमेरिकन ड्रीम': 40% भारतीय-अमेरिकी छोड़ना चाहते हैं अमेरिका, कार्नेगी सर्वे के चौंकाने वाले खुलासे

'अमेरिकन ड्रीम'—डॉलर की चमक, सिलिकॉन वैली की आलीशान नौकरी और लंबी गाड़ियों—के पीछे लाखों भारतीय भागते थे, आज वही सपना दरकता नजर आ रहा है। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की 2026 की नवीनतम रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है।

22 Apr 2026  |  31

 

वाशिंगटन/नई दिल्ली | कल तक जिस 'अमेरिकन ड्रीम'—डॉलर की चमक, सिलिकॉन वैली की आलीशान नौकरी और लंबी गाड़ियों—के पीछे लाखों भारतीय भागते थे, आज वही सपना दरकता नजर आ रहा है। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की 2026 की नवीनतम रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में रहने वाले हर 10 में से 4 भारतीय-अमेरिकी (40%) अब अमेरिका छोड़ने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

यह आंकड़ा उस समुदाय का है जो अमेरिका की आबादी का मात्र 1.5% होने के बावजूद वहां के टैक्स बेस में 6% का योगदान देता है। आखिर क्यों यह 'सबसे सफल माइनॉरिटी' खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है?

1. राजनीतिक मोहभंग और असुरक्षा का भाव

पलायन की सोच रखने वाले 58% लोगों ने सबसे बड़ी वजह अमेरिका के 'राजनीतिक माहौल' को बताया है।

ट्रंप 2.0 का असर: डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान बढ़ते ध्रुवीकरण और 'अमेरिका सिर्फ अमेरिकियों के लिए' जैसी नीतियों ने भारतीयों में असुरक्षा पैदा की है। सर्वे के अनुसार, 71% भारतीय-अमेरिकी वर्तमान प्रशासन के कामकाज से असंतुष्ट हैं।

पार्टियों से दूरी: भारतीय अब न तो पक्के डेमोक्रेट रहे और न ही रिपब्लिकन। 30% भारतीय अब 'इंडिपेंडेंट' विचारधारा की ओर झुक रहे हैं, जो दर्शाता है कि उनका भरोसा अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था से उठ रहा है।

2. इमिग्रेशन का 'डेथ वारंट': 70 साल का इंतज़ार

स्किल्ड वर्कर्स के लिए अमेरिका का इमिग्रेशन सिस्टम अब एक 'ब्रोकन सिस्टम' बन चुका है।

वीजा बुलेटिन की कड़वी सच्चाई: मई 2026 के वीजा बुलेटिन के अनुसार, EB-2 और EB-3 जैसी श्रेणियों में कट-ऑफ डेट अभी भी 2013-14 पर अटकी हुई है।

अनंत प्रतीक्षा: विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन कार्ड के लिए कुछ भारतीयों को 70 साल तक इंतज़ार करना पड़ सकता है। H-1B वीजा की अनिश्चितता के कारण परिवार खुद को वहां कभी 'स्थायी' महसूस नहीं कर पाते।

3. महंगाई की मार: 2.5 करोड़ में एक बच्चा!

अमेरिका अब रहने के लिए एक सस्ता देश नहीं रहा। मध्यमवर्गीय भारतीयों के लिए वहां का खर्च उठाना मुश्किल हो गया है:

चाइल्डकेयर का बोझ: USDA की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में एक बच्चे को 18 साल तक पालने का खर्च लगभग 3 लाख डॉलर (करीब 2.5 करोड़ रुपये) तक पहुँच गया है।

आवास संकट: सैन फ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में एक बेडरूम के अपार्टमेंट का किराया $3,000 से $5,000 प्रति माह है, जो औसत आय का 40% तक खा जाता है।

4. 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन': भारत का बढ़ता आकर्षण

जहाँ एक तरफ अमेरिका में चुनौतियाँ बढ़ी हैं, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था एक चुंबक की तरह काम कर रही है।

तेज विकास दर: IMF के अनुसार, भारत 6.5% की दर के साथ दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है।

टेक हब बेंगलुरु-हैदराबाद: सिलिकॉन वैली में $200,000 कमाने वाला इंजीनियर अब बेंगलुरु या गुड़गांव में भी प्रतिस्पर्धी वेतन और बेहतर लाइफस्टाइल पा रहा है। सबसे बड़ा आकर्षण है—अपना कल्चर और परिवार का साथ।

निष्कर्ष: बदलता वैश्विक संतुलन

यह सर्वे सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक बड़े वैश्विक बदलाव का संकेत है। अमेरिका छोड़ने की चाह रखने वाले लोग सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दुबई जैसे देशों की ओर भी देख रहे हैं, जहाँ नागरिकता के नियम सरल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वाशिंगटन ने अपनी इमिग्रेशन नीतियों और सामाजिक सुरक्षा में सुधार नहीं किया, तो वह दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमागों को खो देगा। 'अमेरिकन ड्रीम' की ये दरारें नई दिल्ली के लिए एक बड़ा अवसर और वाशिंगटन के लिए एक गंभीर अलार्म बेल हैं।

"जब टैलेंट अपनी जड़ें तलाशने लगता है, तो दुनिया के नक्शे पर ताकत का संतुलन बदलना तय है।"

अन्य खबरें