कोलकाता | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अंतिम चरणों के बीच राजनीतिक बयानबाजी ने व्यक्तिगत हमलों का रूप ले लिया है। टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी द्वारा गृह मंत्री अमित शाह पर किए गए पलटवार के बाद, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मोर्चा संभालते हुए अभिषेक बनर्जी के बयानों को उनकी 'हताशा' का प्रतीक बताया है।
धर्मेंद्र प्रधान का पलटवार: "हार मान चुकी है टीएमसी"
धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर अभिषेक बनर्जी के बयानों को 'सड़क-छाप उकसावा' करार दिया। उन्होंने कहा कि अभिषेक की भाषा यह साबित करती है कि तृणमूल नेतृत्व के भीतर हार का डर बैठ गया है।
धमकी बनाम लोकतंत्र: प्रधान ने लिखा, "अमित शाह ने बंगाल में लोकतंत्र और सुरक्षा की बात की है, जबकि अभिषेक बनर्जी ने इसका जवाब धमकियों से दिया है। यह ठीक उसी डर की राजनीति की पुष्टि करता है जिसे बंगाल की जनता सालों से झेल रही है।"
संवाद की आवश्यकता: उन्होंने आगे कहा कि बंगाल को आज बाहुबल दिखाने वाले नेतृत्व की नहीं, बल्कि स्वस्थ राजनीतिक संवाद की जरूरत है।
विवाद की शुरुआत: अभिषेक बनर्जी के गंभीर आरोप
इससे पहले अभिषेक बनर्जी ने अमित शाह पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपमान करने का आरोप लगाकर विवाद को हवा दी थी। अभिषेक का गुस्सा अमित शाह द्वारा चुनाव सभा में ममता बनर्जी को संबोधित करने के तरीके पर था।
'ऐ दीदी' संबोधन पर आपत्ति: अभिषेक ने कहा कि मंगलवार को एक सभा में अमित शाह ने मुख्यमंत्री को 'ऐ दीदी' कहकर संबोधित किया, जो अत्यंत अपमानजनक है।
2021 की याद: उन्होंने इसकी तुलना 2021 के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के 'दीदी ओ दीदी' वाले संबोधन से की। अभिषेक ने कहा, "अमित शाह भूल गए कि वह अपने से उम्र में बड़ी एक महिला मुख्यमंत्री से बात कर रहे हैं। यह महिलाओं के प्रति भाजपा के वास्तविक नजरिये को दर्शाता है।"
धर्मेंद्र प्रधान का जनता को संदेश
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने बयान में विश्वास जताया कि बंगाल की जनता अब डर की राजनीति को नकारने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि टीएमसी नेतृत्व द्वारा दिए जा रहे इस तरह के बयान मतदाताओं के लोकतांत्रिक बदलाव के संकल्प को और अधिक मजबूत करेंगे।
निष्कर्ष
जैसे-जैसे मतदान की तारीख (23 अप्रैल) करीब आ रही है, भाजपा और टीएमसी के बीच का यह संघर्ष और भी तीव्र होता जा रहा है। जहाँ भाजपा सुशासन और सुरक्षा को मुद्दा बना रही है, वहीं टीएमसी इसे 'बंगाल की अस्मिता' और महिला सम्मान से जोड़कर मतदाताओं को लामबंद करने की कोशिश कर रही है।
एक प्रासंगिक सवाल: क्या आपको लगता है कि चुनावी रैलियों में शीर्ष नेताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का असर सीधे तौर पर वोटिंग पैटर्न पर पड़ता है, या जनता केवल स्थानीय मुद्दों और विकास के आधार पर फैसला लेती है?