तपते भारत पर 'इकोनॉमिक हीटवेव' का साया: $159 बिलियन की उत्पादकता खा गई गर्मी, GDP को 8.7% तक चोट की आशंका

अत्यधिक गर्मी के कारण भारत की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इस दशक के अंत तक, लू के कारण भारत की GDP को 2.5% से 4.5% तक का घाटा हो सकता है। विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि भीषण लू (Heatwave) अब देश के लिए एक गंभीर आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है।

24 Apr 2026  |  16

 

नई दिल्ली: भारत में आसमानी आफत बनकर बरस रही गर्मी अब केवल एक मौसमी बदलाव या स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई है। विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि भीषण लू (Heatwave) अब देश के लिए एक गंभीर आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है। जहाँ एक ओर मौसम विभाग (IMD) ने दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा और बिहार सहित कई राज्यों में 'रेड अलर्ट' जारी किया है, वहीं दूसरी ओर इसके दूरगामी आर्थिक परिणाम देश की विकास दर को सुस्त कर रहे हैं।

उत्पादकता पर प्रहार: 160 अरब काम के घंटे बर्बाद

अत्यधिक गर्मी के कारण भारत की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, लू के कारण अब तक लगभग $159 बिलियन की उत्पादकता का नुकसान हो चुका है।

काम के घंटों का नुकसान: हर साल 160 अरब से ज्यादा श्रम घंटे बर्बाद हो रहे हैं, क्योंकि निर्माण और कृषि जैसे क्षेत्रों में मजदूर भीषण तपिश के कारण अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं।

GDP पर असर: इस दशक के अंत तक, लू के कारण भारत की GDP को 2.5% से 4.5% तक का घाटा हो सकता है। यदि ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो सदी के मध्य तक यह नुकसान 8.7% तक पहुँच सकता है।

महंगा इलाज: एक मध्यमवर्गीय परिवार की पूरी बचत पर खतरा

गर्मी से जुड़ी बीमारियाँ केवल शारीरिक कष्ट नहीं, बल्कि वित्तीय बोझ भी बढ़ा रही हैं। अपोलो हॉस्पिटल्स के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. नितिन जगासिया के अनुसार:

"गंभीर हीटस्ट्रोक के इलाज में प्रति मरीज 1 लाख से 2 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है। यह रकम एक कामकाजी परिवार की जीवन भर की बचत खत्म करने के लिए काफी है।"

चौंकाने वाली बात यह है कि 40% शहरी और 60% ग्रामीण परिवारों को हीटस्ट्रोक के मेडिकल बिलों का भुगतान करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है या अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है। इसमें ठीक होने के दौरान हफ्तों तक होने वाली आय का नुकसान शामिल नहीं है।

थाली पर भी आफत: खाद्य सुरक्षा और महंगाई

FAO और WMO की संयुक्त रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक गर्मी कृषि प्रणालियों के लिए सबसे बड़ा जोखिम है।

फसल चक्र प्रभावित: प्रमुख नदी घाटियों में चावल का उत्पादन खतरे में है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था: फसल खराब होने और किसानों की उत्पादकता घटने से ग्रामीण बाजारों में मांग कम हो रही है।

महंगाई का दबाव: खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी से आम आदमी की क्रय शक्ति (Spending Capacity) घट रही है, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

2024-25: और भी भयावह हो सकते हैं आंकड़े

अनुमानों के अनुसार, साल 2024 में गर्मी से प्रभावित क्षेत्रों में 247 अरब श्रम घंटों का नुकसान हुआ, जिससे लगभग $194 अरब का आर्थिक घाटा हुआ है। IMD के अनुसार, इस साल न केवल दिन का तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है, बल्कि रातें भी गर्म रहने के कारण 'हीट स्ट्रेस' (Heat Stress) चरम पर है।

विशेषज्ञों की सलाह: अब 'हीट एक्शन प्लान' अनिवार्य

विशेषज्ञों का मानना है कि अब लू को केवल एक मौसमी घटना मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ेगा। देश को एक बहुस्तरीय सार्वजनिक नीति की आवश्यकता है जिसमें:

मजदूरों के लिए सुरक्षित कार्य घंटे तय हों।

कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (शीतलन बुनियादी ढांचा) का विस्तार किया जाए।

स्वास्थ्य बीमा की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित हो।

'हीट एक्शन प्लान' को हर जिले में सख्ती से लागू किया जाए।

भारत के लिए यह समय केवल ठंडी जगहों की तलाश का नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को 'पिघलने' से बचाने के लिए ठोस रणनीति बनाने का है।

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