खाद्य सुरक्षा का नया संकल्प: उर्वरक क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' बनेगा भारत की आत्मनिर्भरता का आधार

केवल नारा नहीं, बल्कि दशकों तक भारत की कृषि स्थिरता और आर्थिक मजबूती की गारंटी है स्वदेशी उर्वरक।

10 May 2026  |  53

 

नई दिल्ली। भारत की कृषि सफलता का आधार अब तक एक विस्तृत उर्वरक पारिस्थितिकी तंत्र रहा है, लेकिन इसके पीछे 'आयात पर अत्यधिक निर्भरता' की एक बड़ी कमजोरी भी छिपी है। वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, विशेष रूप से रूस-यूक्रेन संघर्ष और चीन द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों ने भारत की इस नाजुक स्थिति को उजागर कर दिया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट के भीतर ही भारत के लिए 'मेक इन इंडिया' उर्वरक और फसल पोषण पद्धतियों को आधुनिक बनाने का एक शक्तिशाली अवसर छिपा है।

आयात का बोझ और वैश्विक अस्थिरता

भारत अपनी उर्वरक आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है:

पोटाश (MOP): घरेलू भंडार की कमी के कारण 90-100% आयात।

फॉस्फेटिक उर्वरक: मोरक्को और जॉर्डन जैसे देशों पर 85-90% निर्भरता।

यूरिया: घरेलू क्षमता बढ़ने के बावजूद अब भी 10-15% आयात पर निर्भर। रूस से पोटाश और चीन से आने वाले 'स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स' की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे भारत का सब्सिडी बिल भी वित्तीय रूप से तनावपूर्ण हो गया है।

समाधान: संतुलित पोषण और नैनो तकनीक

संकट के इस दौर में अब पारंपरिक 'यूरिया-केंद्रित' खेती से हटकर संतुलित फसल पोषण की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।

माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का महत्व: जिंक, बोरॉन और आयरन जैसे तत्वों का उपयोग उर्वरक दक्षता बढ़ाने और पैदावार में सुधार करने के लिए अनिवार्य है।

स्वदेशी नवाचार: चीन के प्रतिबंधों के बीच 'एरीज एग्रो लिमिटेड' जैसी भारतीय कंपनियां उच्च-घनत्व (HD) वाले पानी में घुलनशील NPK उर्वरक पेश कर रही हैं। ये पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में मात्र 1/5 खुराक में बेहतर परिणाम देते हैं और लागत कम करते हैं।

3-इन-1 उत्पाद: विशेष फसलों के लिए बनाए गए ये मिश्रण किसानों के लिए श्रम और लॉजिस्टिक्स की लागत कम करते हैं।

'दुनिया की उर्वरक फैक्ट्री' बनने की ओर भारत

विशेषज्ञों का प्रस्ताव है कि भारत को न केवल अपनी जरूरतों के लिए बल्कि निर्यात के लिए भी तैयार होना चाहिए।

घरेलू उत्पादन का विस्तार: बोरिक एसिड, पोटेशियम नाइट्रेट और चिलेटेड माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का उत्पादन भारत में ही बढ़ाने की जरूरत है।

नीतिगत समर्थन: सभी अधिसूचित उर्वरकों पर 5% की समान GST दर लागू करने से घरेलू निर्माताओं को समान अवसर मिलेंगे।

निर्यात को प्रोत्साहन: यदि बिना सब्सिडी वाले कच्चे माल से भारत में उर्वरक बनाए जाते हैं, तो उन्हें वैश्विक बाजार में निर्यात करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

लागत और ऊर्जा की चुनौती

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण पैकेजिंग और माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है। इसके समाधान के रूप में निर्माताओं को हरित और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों (जैसे ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम) की ओर रुख करना चाहिए। इससे न केवल पर्यावरण की सुरक्षा होगी, बल्कि जीवाश्म ईंधन के उतार-चढ़ाव वाले बाजार से भी सुरक्षा मिलेगी।

निष्कर्ष: प्रणालीगत परिवर्तन का समय

यह संकट केवल आपूर्ति की समस्या नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थागत बदलाव का आह्वान है। "मेक इन इंडिया" उर्वरक क्षेत्र के लिए केवल एक चुनावी नारा नहीं है, बल्कि यह आने वाले दशकों के लिए भारत की खाद्य सुरक्षा, आर्थिक लचीलेपन और कृषि स्थिरता की नींव है। जिम्मेदारीपूर्ण व्यापारिक प्रथाओं, किसान शिक्षा और सही सरकारी नीतियों का मेल ही भारत को एक आत्मनिर्भर कृषि शक्ति बनाएगा।

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