जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध 'एग्रोफॉरेस्ट्री' बनेगा ढाल: विकसित भारत 2047 के लिए कृषि का नया रोडमैप

खेती के साथ पेड़ों का संगम; न केवल बढ़ेगी किसानों की आय, बल्कि सुरक्षित होगा पर्यावरण और भविष्य।

10 May 2026  |  61

 

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की हकीकत बन चुका है। भारत में बढ़ते तापमान, अनिश्चित मानसून और गिरते मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) ने करोड़ों किसानों की आजीविका पर संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में 'एग्रोफॉरेस्ट्री' (कृषि-वानिकी) एक ऐसे क्रांतिकारी समाधान के रूप में उभर रही है, जो न केवल पारिस्थितिक लचीलापन (Ecological Resilience) लाएगी, बल्कि भारतीय कृषि को भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयार करेगी।

संकट में खेती: क्यों जरूरी है बदलाव?

ग्रामीण भारत में कृषि न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा की रीढ़ भी है। वर्तमान में:

भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 54.8 प्रतिशत हिस्सा कृषि भूमि के रूप में उपयोग किया जाता है।

देश की कार्यशक्ति का 54.6 प्रतिशत हिस्सा कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों में लगा हुआ है। मौसम की अनिश्चितता के कारण फसलें बर्बाद हो रही हैं और किसानों की आय में भारी अस्थिरता देखी जा रही है। 'विकसित भारत 2047' के विजन को साकार करने के लिए कृषि क्षेत्र में जलवायु कार्रवाई (Climate Action) को समावेशी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाना अनिवार्य हो गया है।

एग्रोफॉरेस्ट्री: आय और पर्यावरण का संतुलन

एग्रोफॉरेस्ट्री वह तकनीक है जिसमें फसलों और पशुधन के साथ-साथ पेड़ों को भी एकीकृत किया जाता है। इसके लाभ बहुआयामी हैं:

अतिरिक्त आय: अनाज के साथ-साथ किसान लकड़ी, फल, चारा और अन्य वृक्ष-आधारित उत्पादों के माध्यम से कमाई के नए स्रोत बना सकते हैं।

भूमि उत्पादकता: पेड़ मिट्टी की नमी बनाए रखने और उसकी उर्वरता बढ़ाने में मदद करते हैं।

आसान विस्तार: बड़े पैमाने पर वनीकरण (Afforestation) के लिए अलग से जमीन और लंबे समय की आवश्यकता होती है, लेकिन एग्रोफॉरेस्ट्री मौजूदा खेती के ढांचे के भीतर ही फिट हो जाती है।

कार्बन उत्सर्जन कम करने में बड़ी भूमिका

भारत की विशाल कृषि भूमि के कारण, एग्रोफॉरेस्ट्री को थोड़ा सा भी अपनाने से कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी लाई जा सकती है। यह तकनीक बिना किसी बड़े व्यवधान के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-climatic zones) में आसानी से लागू की जा सकती है।

निष्कर्ष: नीतिगत समर्थन और निजी निवेश की दरकार

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार का निरंतर नीतिगत समर्थन मिले और निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे आए, तो एग्रोफॉरेस्ट्री भारत की कृषि प्रणाली का केंद्र बन सकती है। यह न केवल आर्थिक स्थिरता प्रदान करेगी, बल्कि भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने में भी सक्षम बनाएगी।

"एग्रोफॉरेस्ट्री केवल पेड़ लगाना नहीं है; यह एक लचीली, भविष्य के लिए तैयार और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था की नींव है।"

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