भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल ₹70,000 करोड़ के पार जाने का अनुमान: आयात निर्भरता और वैश्विक कीमतें बनीं बड़ी चुनौती

बजटीय लक्ष्यों से आगे निकला खर्च; सरकार किसानों को मूल्य वृद्धि से बचाने के लिए वित्तीय बोझ सहने को तैयार।

14 May 2026  |  56

 

नई दिल्ली। भारत का कृषि क्षेत्र एक गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। ताजा सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस वित्त वर्ष में भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल बजटीय आवंटन से कहीं अधिक बढ़ सकता है। वैश्विक कीमतों में उछाल, भू-राजनीतिक अस्थिरता और आयात पर भारी निर्भरता ने मिलकर एक ऐसा आर्थिक संकट पैदा किया है, जो देश की राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) की परीक्षा ले रहा है।

बजट से ₹70,000 करोड़ अधिक खर्च होने का अनुमान

व्यय विभाग (Department of Expenditure) के आंतरिक अनुमानों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में कुल उर्वरक सब्सिडी का खर्च लगभग ₹2.4 लाख करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। यह केंद्रीय बजट में आवंटित ₹1.71 लाख करोड़ से करीब ₹70,000 करोड़ अधिक है।

इस भारी बढ़ोतरी के पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख पोषक तत्वों— डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और यूरिया—की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई भारी तेजी है।

वैश्विक संकट और कीमतों में उछाल

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है। CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार:

यूरिया: मार्च 2026 से इसकी कीमतों में 85% की वृद्धि हुई है, जो अब 950 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है।

DAP: इसकी कीमतों में 30% का उछाल आया है और यह 900 डॉलर प्रति टन के पार है।

कच्चा माल: अमोनिया और सल्फर जैसे प्रमुख घटकों की कीमतों में भी क्रमशः 60% और 50% की वृद्धि दर्ज की गई है।

आयात पर भारी निर्भरता: एक बड़ी कमजोरी

भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में से एक है।

भारत अपनी DAP जरूरतों का 80% से अधिक और यूरिया की दो-तिहाई जरूरतें विदेशों से पूरी करता है।

स्थानीय संयंत्र वर्तमान में केवल 30-35% यूरिया की मांग पूरी कर पा रहे हैं।

आगामी खरीफ सीजन (धान, मक्का, सोयाबीन और दालें) के लिए सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों से खरीद तेज कर दी है। हाल ही में सऊदी अरब, रूस, मिस्र और मोरक्को जैसे देशों से बड़े पैमाने पर खरीद के अनुबंध किए गए हैं।

सरकार की प्राथमिकता: किसान और खाद्य सुरक्षा

वित्तीय दबाव के बावजूद, केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ किसानों पर नहीं डालेगी। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सब्सिडी का बोझ सरकार स्वयं उठाएगी ताकि किसानों को उर्वरक पुरानी कीमतों पर ही मिलता रहे।

यह रुख भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इससे पहले भी यूक्रेन संघर्ष (FY23) के दौरान सब्सिडी बिल ₹2.54 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, जिसे सरकार ने वहन किया था।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि आयात पर यह निर्भरता भारत को वैश्विक उतार-चढ़ाव और विनिमय दर (Exchange Rate) के जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है।

समाधान: घरेलू उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाना और आयात के स्रोतों में विविधता लाना समय की मांग है।

Atmanirbhar Bharat: उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता लाने के लिए नई उत्पादन इकाइयों और वैकल्पिक पोषक तत्वों (Alternative Nutrients) में निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है।

निष्कर्ष:

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह वित्तीय अनुशासन और किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखता है। आने वाले समय में घरेलू क्षमता का विस्तार ही देश को भविष्य के वैश्विक झटकों से बचाने का एकमात्र स्थायी रास्ता होगा।

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