अन्नदाता पर 'ऊर्जा संकट' की मार: जम्मू में धान की बुवाई से पहले डीजल की किल्लत ने बढ़ाई धड़कनें

"खेत तैयार, पर ट्रैक्टर बेजार": वैश्विक संकट के बीच ईंधन की अनिश्चितता बनी विलेन; किसानों ने प्रधानमंत्री से लगाई विशेष कोटे की गुहार।

15 May 2026  |  69

 

जम्मू: वैश्विक स्तर पर गहराते ऊर्जा संकट की तपिश अब जम्मू के खेतों तक पहुँच गई है। एक महीने बाद शुरू होने वाले धान की बुवाई के सीजन से ठीक पहले डीजल की कमी ने स्थानीय किसानों की नींद उड़ा दी है। जहाँ एक तरफ नर्सरी में चावल के पौधे तैयार हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खेतों की जुताई के लिए ट्रैक्टरों में भरने को डीजल मयस्सर नहीं हो पा रहा है।

बुवाई सीजन पर मंडराया खतरा

धान की फसल के लिए मिट्टी को तैयार करना सबसे श्रमसाध्य और मशीनीकृत प्रक्रिया है। किसानों के अनुसार:

जुताई की चुनौती: मिट्टी को बुवाई के लायक बनाने के लिए कई बार ट्रैक्टर चलाने पड़ते हैं, जो पूरी तरह डीजल पर निर्भर हैं।

पीक सीजन का डर: किसानों को डर है कि जब बुवाई का मुख्य समय आएगा, तब ईंधन की उपलब्धता और भी कम हो सकती है।

फसल चक्र पर असर: यदि समय पर डीजल नहीं मिला, तो खेतों की तैयारी रुक जाएगी, जिससे पूरी फसल का चक्र प्रभावित हो सकता है।

ईंधन बचत की अपील से बढ़ी उलझन

हाल ही में ईंधन बचत को लेकर जारी अपीलों ने किसानों के संशय को और बढ़ा दिया है। किसानों का मानना है कि यदि अभी से ही सख्ती और सप्लाई में कटौती दिख रही है, तो अगले एक महीने में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। आधुनिक खेती में बिना डीजल के मशीनों का चलना असंभव है, ऐसे में यह समय अन्नदाताओं के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

सरकार से विशेष हस्तक्षेप की मांग

जम्मू और पंजाब जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों के किसानों ने अब केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखना शुरू कर दिया है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

विशेष कृषि कोटा: कृषि कार्यों के लिए डीजल का एक विशेष कोटा निर्धारित किया जाए।

सुचारू सप्लाई: यह सुनिश्चित किया जाए कि बुवाई के पीक सीजन में पेट्रोल पंपों पर ट्रैक्टरों के लिए पर्याप्त ईंधन मौजूद रहे।

ठोस रणनीति: वैश्विक ऊर्जा संकट का असर खाद्य सुरक्षा पर न पड़े, इसके लिए जम्मू-कश्मीर और पंजाब के लिए अलग से सप्लाई चेन मैनेजमेंट बनाया जाए।

खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती

ऊर्जा संकट केवल एक तकनीकी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा (Food Security) और किसानों की आजीविका पर सीधा हमला है। यदि समय रहते डीजल की किल्लत दूर नहीं की गई, तो जम्मू के सुनहरे खेतों के बंजर रह जाने का खतरा बढ़ जाएगा। किसानों का साफ कहना है कि सरकार को इस मामले में तुरंत दखल देकर अन्नदाताओं को इस 'अग्निपरीक्षा' से बाहर निकालना चाहिए।

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