हाइब्रिड धान के बीजों पर केंद्र-पंजाब में ठनी: डी-नोटिफिकेशन की मांग पर बनेगा एक्सपर्ट पैनल, जानिए क्या है पूरा विवाद

राइस मिलर्स के घाटे और ICAR की वैज्ञानिक रिपोर्ट के बीच फंसा पेंच; खरीफ सीजन से पहले केंद्र सरकार फूंक-फूंक कर रख रही है कदम।

16 May 2026  |  100

 

 

नई दिल्ली/चंडीगढ़: भारत के कृषि क्षेत्र में इस समय पंजाब के हाइब्रिड धान (Hybrid Paddy) के बीजों को लेकर एक बड़ा विवाद गरमाया हुआ है। आगामी खरीफ बुवाई सीजन से ठीक पहले, पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार से गैर-बासमती हाइब्रिड धान की सभी किस्मों को 'डी-नोटिफाई' (अधिसूचना रद्द) करने की गुहार लगाई है। पंजाब का दावा है कि इन बीजों से तैयार फसल की मिलिंग (कुटाई) के दौरान चावल की रिकवरी उम्मीद से बहुत कम हो रही है।

इस संवेदनशील मामले पर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच एक उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक के बाद केंद्र सरकार ने इस विवाद की कानूनी, वैज्ञानिक और औद्योगिक पहलुओं से जांच करने के लिए एक विशेष एक्सपर्ट कमेटी (विशेषज्ञ पैनल) बनाने का फैसला किया है।

विवाद की असली वजह: मिलिंग रिकवरी दर (Milling Recovery Rate)

पंजाब सरकार और राज्य के राइस मिलर्स का आरोप है कि कुछ हाइब्रिड धान के बीजों के कारण मिलिंग के समय चावल की पैदावार (Head Rice Yield) काफी घट जाती है।

नियम क्या है?: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के नियमों के मुताबिक, मिलर्स को धान की कुटाई के बाद कम से कम 67 प्रतिशत चावल की रिकवरी (FCI को सौंपना) देनी अनिवार्य होती है।

नुकसान का डर: पंजाब का कहना है कि हाइब्रिड बीजों से तैयार फसल में यह रिकवरी 67% से नीचे आ रही है, जिससे मिलर्स और किसानों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है। पंजाब सरकार चाहती है कि इन बीजों को डी-नोटिफाई कर दिया जाए ताकि राज्य स्तर पर इनकी बिक्री पर कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाया जा सके।

कानूनी पेंच और ICAR की वैज्ञानिक रिपोर्ट

यह विवाद नया नहीं है। अगस्त 2025 में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार द्वारा अप्रैल 2024 में हाइब्रिड धान के बीजों पर लगाए गए प्रतिबंध को उलट दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब तक केंद्र सरकार के स्तर पर ये बीज 'नोटिफाइड' (अधिसूचित) हैं, तब तक पंजाब एकतरफा इनकी बिक्री पर रोक नहीं लगा सकता।

दूसरी तरफ, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की रिपोर्ट ने केंद्र सरकार के लिए दुविधा बढ़ा दी है। ICAR की वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार, 2015 के बाद से देश में जारी की गई सभी 23 हाइब्रिड धान की किस्में न्यूनतम मिलिंग मानकों (67% रिकवरी) को पूरी तरह पूरा करती हैं। इस वैज्ञानिक दावे के कारण केंद्र सरकार बिना पुख्ता सबूत के कोई भी जल्दबाजी में कदम उठाने से बच रही है, क्योंकि बीज कंपनियां इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं।

धान के अलावा पंजाब की अन्य मांगें

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस बैठक में केवल बीजों का मुद्दा ही नहीं उठाया, बल्कि पंजाब की कृषि लचीलेपन (Agricultural Resilience) को मजबूत करने के लिए कई अन्य माँगें भी रखीं:

केंद्रीय बीज समिति (Central Seed Committee) में पंजाब को प्रतिनिधित्व देने की मांग।

आगामी 2026-27 सीजन के लिए गेहूं के बीज की सब्सिडी का आवंटन।

राज्य में खाद (Fertiliser) की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना।

गिरते भूजल स्तर और मिट्टी की उर्वरता को बचाने के लिए कपास, दलहन, तिलहन और बागवानी फसलों के लिए व्यापक केंद्रीय सहायता की मांग।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पंजाब को आश्वासन दिया है कि केंद्र सरकार जल प्रबंधन और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) सहित राज्य की सभी कृषि पहलों में पूरा सहयोग करेगी।

उद्योग और कृषि नीति पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें भारतीय बीज उद्योग और खाद्य सुरक्षा के लिए एक मिसाल (Precedent) बनेंगी।

बीज कंपनियों में हलचल: निजी बीज कंपनियाँ इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं, क्योंकि अचानक नियामक बदलावों (Regulatory Changes) से उनके रिसर्च और बिजनेस मॉडल पर सीधा असर पड़ेगा।

नीतिगत चुनौती: यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि भविष्य में कृषि नीतियों को केवल प्रयोगशाला के वैज्ञानिक दावों पर नहीं, बल्कि जमीन पर किसानों और मिलर्स की व्यावहारिक चुनौतियों (Ground Realities) को ध्यान में रखकर बनाना होगा।

आगे क्या?

खरीफ सीजन बिल्कुल नजदीक है और पंजाब सरकार चाहती है कि इस सीजन में किसान इन विवादित बीजों को न बोएं। अब सभी की निगाहें नवनिर्मित केंद्रीय समिति की बैठकों पर टिकी हैं। चुनौती यह है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों, आर्थिक हितों और कानूनी व्यवस्था के बीच एक ऐसा संतुलन बनाया जाए जो किसान, बीज निर्माता और उपभोक्ता तीनों के लिए न्यायसंगत हो।

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