होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट पहुंचा पंजाब के खेतों तक: मशरूम उद्योग पर मंडराया संकट, कीमतें 50% तक बढ़ने के आसार

ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की मार; अमृतसर में केवल 20% किसानों ने ही उठाया खेती का जोखिम, कंपोस्ट और उर्वरकों के दाम तीन गुना बढ़े।

19 May 2026  |  75

 

अमृतसर: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पैदा हुई बाधाओं का वैश्विक असर अब पंजाब के कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिखने लगा है। हर साल मई के महीने में शुरू होने वाली मिल्की मशरूम की खेती इस बार गहरे संकट में है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण उर्वरक, कंपोस्ट और ईंधन की लागत इस कदर बढ़ गई है कि राज्य के अधिकांश उत्पादकों ने इस सीजन में खेती शुरू करने से ही तौबा कर लिया है।

हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमृतसर जिले के जंडियाला गुरु, मानांवाला, वेरका और अजनाला जैसे प्रमुख मशरूम उत्पादक क्षेत्रों में इस बार महज 20 प्रतिशत किसानों ने ही उत्पादन का जोखिम उठाया है।

तीन गुना तक महंगे हुए उर्वरक और कंपोस्ट

अमृतसर के प्रमुख मशरूम उत्पादक जागीर सिंह के मुताबिक, युद्ध जैसे हालातों के कारण नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, कंपोस्ट और परिवहन लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है।

लागत में भारी उछाल: जो कंपोस्ट पहले किसानों को ₹12,000 से ₹15,000 प्रति ट्रॉली मिल जाती थी, उसके दाम अब बढ़कर ₹35,000 से ₹40,000 तक पहुंच चुके हैं।

सप्लाई चेन प्रभावित: होर्मुज मार्ग प्रभावित होने से मानांवाला क्षेत्र में उर्वरकों की आयातित सप्लाई चेन बाधित हुई है। कई बड़ी कंपनियों ने समय पर कच्चा माल पहुंचाने में असमर्थता जताई है, जबकि कुछ ने कीमतों में भारी इजाफा कर दिया है।

नियंत्रित वातावरण की खेती पर बिजली-डीजल की मार

जंडियाला गुरु के एक अन्य उत्पादक सरबजीत सिंह ने बताया कि मिल्की मशरूम की खेती पूरी तरह से नियंत्रित वातावरण (Controlled Environment) पर निर्भर करती है। इसके लिए सही तापमान, नमी और साफ-सफाई बनाए रखने के लिए लगातार बिजली की आवश्यकता होती है।

चौतरफा बढ़ी लागत: बिजली की बढ़ती दरों और डीजल के महंगे होने से जनरेटर चलाना बेहद खर्चीला हो गया है। इसके अलावा, प्लास्टिक पैकेजिंग सामग्री और स्थानीय परिवहन भी महंगा हो चुका है। ऐसी स्थिति में छोटे और सीमांत उत्पादकों के लिए बुनियादी लागत निकालना भी नामुमकिन हो गया है।

आम आदमी की थाली से दूर होगा पौष्टिक मशरूम

पंजाब में होटल इंडस्ट्री, रेस्टोरेंट, फास्ट फूड कारोबार और शाकाहारी परिवारों के बीच गर्मियों के दिनों में मिल्की और बटन मशरूम की भारी मांग रहती है। अमृतसर की अनुकूल जलवायु के कारण यहाँ बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन होता है, और स्थानीय खालसा कॉलेज में तो मशरूम उत्पादन के लिए बकायदा एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स भी संचालित किया जाता है।

लेकिन इस बार मांग के मुकाबले आपूर्ति बेहद कम रहने वाली है:

यूनिट्स पर लगे ताले: भारी लागत के डर से राज्य के कई मशरूम यूनिट्स इस बार पूरी तरह बंद पड़े हैं।

कीमतों में उछाल की आशंका: बाजार में मशरूम की भारी किल्लत को देखते हुए आने वाले दिनों में इसके दामों में 30 से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि होने की पूरी संभावना है।

अंतरराष्ट्रीय तनाव की घरेलू मार

यद्यपि मशरूम उद्योग पूरी तरह से आयात आधारित नहीं है, लेकिन उर्वरक, आवश्यक रसायन और ईंधन की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आने वाला कोई भी बदलाव इसकी लागत को सीधा प्रभावित करता है। जानकारों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो होटल और कैटरिंग व्यवसायियों को अपने फूड मेन्यू के दाम बढ़ाने पड़ेंगे। कभी आम आदमी के लिए सस्ती और पौष्टिक मानी जाने वाली मशरूम अब उपभोक्ताओं की पहुंच से दूर होने की कगार पर है।

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