सत्ता गंवाने के बाद सड़क पर उतरी TMC: बंगाल में 'बुलडोज़र एक्शन' और पशु वध कानून के खिलाफ विपक्ष ने खोला मोर्चा

बीजेपी सरकार के एक्शन से गरमाई बंगाल की सियासत; हॉकरों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के खिलाफ तृणमूल का हल्लाबोल, तो नए नियमों के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे वामदल।

20 May 2026  |  62

 

कोलकाता:पश्चिम बंगाल में हुए ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन के बाद अब राजनीतिक सरगर्मियां सड़कों और अदालतों तक पहुंच गई हैं। राज्य में पहली बार सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शुरुआती एक्शन से विपक्षी दल बेहद नाखुश हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने नई सरकार  द्वारा चलाए जा रहे कथित “बुलडोज़र एक्शन” और अल्पसंख्यकों व हॉकरों को निशाना बनाए जाने के खिलाफ कल, गुरुवार (21 मई) को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने का एलान किया है।

दूसरी ओर, वामपंथी दल भी सरकार के कुछ फैसलों के खिलाफ कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं।

हावड़ा-सियालदह सहित इन प्रमुख ठिकानों पर चक्का जाम करेगी TMC

तृणमूल कांग्रेस के अनुसार, कोलकाता और उसके आस-पास के इलाकों में हॉकरों को कथित तौर पर जबरदस्ती हटाए जाने के विरोध में पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरेंगे।

प्रदर्शन के मुख्य केंद्र: हावड़ा स्टेशन, सियालदह स्टेशन और बालीगंज के पास भारी विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे।

कौन होगा शामिल: प्रदर्शन के दौरान टीएमसी के शीर्ष नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हॉकर यूनियनों और अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों के भी बड़ी संख्या में शामिल होने की उम्मीद है।

टीएमसी नेताओं का आरोप है कि चुनाव नतीजों के बाद राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हुई झड़पों में उनके कई कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया और उनकी हत्याएं की गईं, जिसकी अदालत की निगरानी में जांच होनी चाहिए।

पशु वध नियंत्रण कानून के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे वामदल

सड़क पर चल रहे इस घमासान के बीच कानूनी मोर्चे पर भी सरकार को घेरने की तैयारी हो चुकी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की पश्चिम बंगाल यूनिट ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया है। पार्टी ने राज्य सरकार द्वारा 'पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950' को कड़ाई से लागू करने के कदम पर तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

क्या है नया सरकारी नियम?

राज्य सरकार ने 1950 के कानून के तहत अधिसूचित किया है कि गायों और भैंसों सहित किसी भी पशु का वध तब तक नहीं किया जा सकेगा, जब तक किसी सरकारी पशु चिकित्सक द्वारा उसे प्रमाणित न कर दिया जाए। इसके तहत पशु को वध के लिए तभी उपयुक्त माना जाएगा, जब वह स्थायी रूप से अक्षम हो या उसकी आयु 14 साल से अधिक हो।

धार्मिक स्वतंत्रता और आजीविका पर असर का हवाला

वाम दल द्वारा दायर इस जनहित याचिका (PIL) पर मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ के समक्ष जल्द सुनवाई होने की संभावना है।

सीपीएम की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि इस 1950 के "पुराने" कानून के बहाने लगाए जा रहे कठोर प्रतिबंधों से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आजादी प्रभावित होगी। इसके साथ ही, इस फैसले से किसानों और पशु व्यापारियों की आजीविका पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा, जिनमें से कई लोग हिंदू समुदाय से भी ताल्लुक रखते हैं। फिलहाल, इन दोनों मुद्दों ने बंगाल की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है।

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