नई दिल्ली। अफ़गानिस्तान और यूक्रेन जैसे दुनिया के बड़े युद्ध क्षेत्रों में सेनाओं के लिए काल साबित हो रही 'नॉन-मेटेलिक माइंस' (गैर-धातु बारूदी सुरंगों) के खतरे से निपटने के लिए भारतीय सेना अब अपनी तकनीक को पूरी तरह अपग्रेड करने जा रही है। आतंकवादियों और दुश्मन देशों द्वारा पारंपरिक धातु की जगह प्लास्टिक, लकड़ी और सिरेमिक से बने छिपे हुए विस्फोटकों (IEDs) के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया है। सेना के लिए 386 नई पीढ़ी के 'ड्यूल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर्स' की खरीद के लिए करीब 290 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया है।
मौजूदा सिस्टम की कमियां और नया 'ड्यूल' एक्शन
भारतीय सेना वर्तमान में 'Schiebel' और 'Metex' जैसे पारंपरिक मेटल डिटेक्टरों का इस्तेमाल करती है। ये डिटेक्टर जमीन के नीचे दबे केवल धातु (मेटल) से बने हथियारों या सुरंगों को तो पहचान लेते हैं, लेकिन प्लास्टिक या गैर-धातु सामग्री से तैयार घातक विस्फोटकों को पकड़ने में इनकी क्षमता बेहद सीमित हो जाती है।
कैसे काम करेगी नई तकनीक: नई प्रणाली में पारंपरिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मेटल डिटेक्शन के साथ ग्राउंड पेनेट्रेटिंग राडार (GPR) या इन्फ्रारेड (IR) तकनीक को जोड़ा गया है। इसके जरिए यह सिस्टम मेटल और नॉन-मेटल दोनों ही तरह के विस्फोटकों को आसानी से सूंघ लेगा। सैनिक जरूरत के हिसाब से दोनों तकनीकों को एक साथ या अलग-अलग मोड पर चला सकेंगे।
बर्फ से लेकर रेगिस्तान तक: 12 सेमी गहराई में छिपी मौत को पहचानेगा
रक्षा मंत्रालय द्वारा तय किए गए कड़े तकनीकी मानकों के अनुसार, यह नया डिटेक्शन सिस्टम हर मौसम और हर तरह के दुर्गम इलाकों में सेना का सबसे भरोसेमंद साथी बनेगा:
डिटेक्शन क्षमता: यह प्रणाली जमीन के नीचे दबी महज 6 सेंटीमीटर तक की छोटी वस्तुओं और 4 सेंटीमीटर ऊंचाई वाले विस्फोटकों को भी आसानी से पकड़ सकेगी।
गहराई की सीमा: सूखी मिट्टी और रेगिस्तानी रेत में यह करीब 12 सेंटीमीटर की गहराई तक काम करेगा, जबकि बर्फबारी, दलदली या खारे पानी वाले इलाकों में यह 10 सेंटीमीटर नीचे तक छिपे बारूद को खोज निकालेगा।
तापमान की मार: यह हाईटेक उपकरण बेहद ठंडे पहाड़ी इलाकों से लेकर तपते रेगिस्तान यानी -10°C से लेकर +42°C तक के तापमान में बिना रुके काम कर सकता है।
सैनिकों की सुविधा और सुरक्षा का खास ख्याल
युद्ध क्षेत्र और सर्च ऑपरेशन के दौरान सैनिकों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए इस सिस्टम को बेहद व्यावहारिक बनाया गया है। ऑपरेशनल मोड में इसका वजन 8 किलोग्राम से भी कम रखा गया है, ताकि जवान लंबे समय तक गश्त के दौरान इसे आसानी से उठा सकें। सैनिक इसे खड़े होकर, घुटनों के बल बैठकर या लेटकर, हर स्थिति में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें ऑडियो और विजुअल (ध्वनि और रोशनी) दोनों तरह के अलार्म दिए गए हैं, जो खतरे की गंभीरता के हिसाब से अलग-अलग संकेत देंगे।
| मुख्य विशिष्टताएं | विवरण |
|---|---|
| कुल बजट | लगभग ₹290 करोड़ |
| कुल मात्रा | 386 यूनिट्स |
| तकनीक | मेटल डिटेक्शन + GPR / IR तकनीक |
| डिलीवरी की समयसीमा | आदेश मिलने के 540 दिनों के भीतर |
सीमा पर बनेगा नया सुरक्षा ढाल
जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में आतंकवाद-रोधी अभियानों के साथ-साथ चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और पाकिस्तान की नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारतीय जवानों को अक्सर अदृश्य बारूदी सुरंगों का सामना करना पड़ता है। रक्षा मंत्रालय ने चयनित कंपनी को डेढ़ साल (540 दिन) के भीतर सभी 386 यूनिट सेना की कॉम्बैट इंजीनियरिंग यूनिट्स को सौंपने का लक्ष्य दिया है। इस तकनीक के आने से रूट-क्लियरेंस (रास्ता साफ करने के) अभियानों में आईईडी से होने वाले जानमाल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।