मिडिल ईस्ट में अमेरिका को दोहरा झटका: सऊदी और UAE ने अमेरिकी ट्रेजरी से निकाले $15 बिलियन, ईरान पर हमले का भी किया खुलकर विरोध

जंग के बीच महाशक्ति को अपनों ने ही दिया दगा; ट्रेजरी बॉन्ड से पूंजी खींचने से अमेरिकी डॉलर और अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल।

20 May 2026  |  53

 

वाशिंगटन / रियाद। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका के सबसे भरोसेमंद और पारंपरिक सहयोगी माने जाने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने सुपरपावर अमेरिका को 24 घंटे के भीतर दो ऐसे करारे झटके दिए हैं, जिससे व्हाइट हाउस में खलबली मच गई है। ईरान के साथ जारी भीषण तनाव के बीच दोनों खाड़ी देशों ने न सिर्फ अमेरिकी ट्रेजरी (कोष) से अपनी अरबों डॉलर की जमा पूंजी निकालनी शुरू कर दी है, बल्कि ईरान पर दोबारा सैन्य कार्रवाई करने के अमेरिकी प्लान पर भी पानी फेर दिया है।

पहला झटका: $15 अरब की भारी नकदी निकाली, हिलेगी अमेरिकी अर्थव्यवस्था

बुधवार को सामने आए आधिकारिक वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में से अपनी हिस्सेदारी तेजी से घटानी शुरू कर दी है। दोनों देशों ने मिलकर करीब 15 अरब डॉलर (लगभग $16.6 बिलियन) की जमा पूंजी वापस निकाल ली है:

सऊदी अरब का कदम: सऊदी ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी को 10.8 बिलियन डॉलर घटा दिया है। इस निकासी के बाद अब अमेरिकी कोष में सऊदी का 149.6 बिलियन डॉलर का निवेश बचा है।

UAE की कार्रवाई: संयुक्त अरब अमीरात ने भी कदम पीछे खींचते हुए 5.8 बिलियन डॉलर की पूंजी निकाल ली है। अब अमेरिकी ट्रेजरी में यूएई का निवेश घटकर 114.1 बिलियन डॉलर रह गया है।

क्यों लगा अमेरिका को झटका? समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिका दुनिया भर के देशों को 'ट्रेजरी बॉन्ड' बेचकर कर्ज (पूंजी) जुटाता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है। सऊदी और यूएई जैसे बड़े निवेशकों द्वारा अचानक पैसा निकालने से वैश्विक बाजार में अमेरिकी डॉलर की साख कमजोर होगी, अमेरिका के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा और वहां ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।

दूसरा झटका: "हमले से महज 1 घंटे दूर थे ट्रंप..." सऊदी-यूएई के वीटो से टला युद्ध

पैसों की चोट के साथ ही दोनों अरब देशों ने रणनीतिक मोर्चे पर भी अमेरिका को तगड़ा झटका दिया है। अमेरिकी मीडिया वेबसाइट 'एक्सियोस' के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मंगलवार (18 मई) को ईरान पर एक बड़ा हवाई हमला करने की पूरी तैयारी कर चुके थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिकी सेना 'हमले से सिर्फ एक घंटे दूर' थी, लेकिन अंत समय में सऊदी अरब और यूएई के कड़े विरोध के चलते उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा।

तेल ठिकानों की सुरक्षा की दुहाई:

जब अमेरिकी प्रशासन ने इस संभावित जंग को लेकर दोनों सहयोगियों से बात की, तो सऊदी और यूएई ने इस बार अमेरिका का साथ देने से साफ इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि इस युद्ध से उनके खुद के तेल ठिकानों और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचेगा। यह रुख बेहद चौंकाने वाला है, क्योंकि इससे पहले फरवरी-मार्च में जब ईरान-अमेरिका के बीच झड़पें हुई थीं, तब इन्हीं दोनों देशों ने परदे के पीछे से ईरान के कुछ इलाकों पर हमलों में मदद की थी।

अब कतर की मध्यस्थता में बातचीत की टेबल पर ईरान

सऊदी और यूएई के हाथ खींचने के बाद अब युद्ध टलता दिख रहा है। वर्तमान में कतर की मध्यस्थता और पहल पर अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा परमाणु समझौते को लेकर बातचीत का दौर शुरू हो रहा है। हालांकि, ईरान ने भी अपने तेवर कड़े रखे हैं। ईरान का स्पष्ट कहना है कि वह 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Hormuz) के नियंत्रण और अपने 'यूरेनियम शिफ्टिंग' के अधिकार को लेकर किसी भी कीमत पर कोई समझौता या झुकने को तैयार नहीं है। जंग के मोर्चे पर घिरे अमेरिका के लिए खाड़ी देशों का यह बदला रुख बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होने वाला है।

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