भूख के आगे हारी इंसानियत: अफगानिस्तान में बदहाली की पराकाष्ठा, पेट भरने और इलाज के लिए बेटियां बेचने को मजबूर बेबस मां-बाप

कैचलाइन: संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी— 47 लाख लोग भुखमरी की कगार पर; तालिबानी पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती ने मासूम बच्चियों के भविष्य को बनाया 'सौदा'‌।

21 May 2026  |  96

 

 

काबुल/न्यूज़ डेस्क: अफगानिस्तान में गहराते आर्थिक संकट और जानलेवा भूख ने इंसानियत को झकझोर कर रख देने वाले हालात पैदा कर दिए हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से दिल दहला देने वाली खबरें सामने आ रही हैं, जहां लाचार माता-पिता अपने परिवार का पेट भरने, कर्ज चुकाने और बीमार बच्चों का इलाज कराने के लिए अपनी मासूम बेटियों को बेचने या उनका सौदा करने पर मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान की तीन-चौथाई आबादी अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ है और करीब 47 लाख लोग भुखमरी की कगार पर जीवन जी रहे हैं।

'मेरे बच्चे रोटी मांगते हैं, मैं क्या दूं?' — एक बेबस पिता की दास्तान

अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट 'बीबीसी' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान के घोर प्रांत में रहने वाले अब्दुल रशीद अजीमी की कहानी इस त्रासदी का जीवंत उदाहरण है। अब्दुल रशीद कर्ज के दलदल में फंसे हैं और अपनी सात साल की जुड़वां बेटियों (रोकिया और रोहिला) में से एक को बेचने का मन बना रहे हैं।

अब्दुल रशीद ने रोते हुए अपनी बेबसी बयां की:

"मैं अपनी बेटियों को बेचने के लिए तैयार हूं। मैं गरीब हूं, कर्ज में डूबा हूं और बेबस हूं। जब मैं काम की तलाश से खाली हाथ घर लौटता हूं, तो मेरे बच्चे मुझसे रोटी मांगते हैं। लेकिन मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है। काम कहीं है ही नहीं।"

इलाज के एवज में 5 साल की मासूम का सौदा

एक अन्य रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले में सईद अहमद नाम के पिता को अपनी पांच साल की मासूम बेटी 'शाइका' को एक रिश्तेदार के हवाले करना पड़ा। शाइका के अपेंडिक्स और लीवर में सिस्ट (गांठ) थी, जिसके ऑपरेशन के लिए पिता के पास पैसे नहीं थे।

सईद अहमद ने बताया कि 2 लाख अफगानी (स्थानीय मुद्रा) के एक समझौते के तहत उन्होंने बेटी को रिश्तेदार को सौंपा है, जिसके बदले तात्कालिक रूप से ऑपरेशन का खर्च मिला है। भविष्य में शाइका की शादी उसी रिश्तेदार के परिवार में कर दी जाएगी।

आखिर बेटियों को ही क्यों बनाया जा रहा है निशाना?

विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों के अनुसार, इस अमानवीय मजबूरी के पीछे कई गहरे सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं:

लैंगिक असमानता और तालिबानी पाबंदियां: तालिबान शासन के आने के बाद महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा व रोजगार पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। लड़कियों के स्कूल बंद होने से समाज में उन्हें 'आर्थिक बोझ' के रूप में देखा जाने लगा है, जबकि बेटों को भविष्य का सहारा माना जाता है।

बाल विवाह की कुप्रथा: अफगानिस्तान में कम उम्र में निकाह की परंपरा रही है, जिसमें दूल्हे का परिवार लड़की के माता-पिता को पैसे या सामान देता है। अब चरम गरीबी के दौर में लोग इसे 'आर्थिक राहत' के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती ने और बिगाड़े हालात

कुछ साल पहले तक वैश्विक समुदाय और अमेरिका द्वारा दी जाने वाली सहायता के जरिए लाखों अफगान परिवारों को आटा, दाल, तेल और बच्चों के लिए पोषण आहार मिल रहा था। लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद वैश्विक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय सहायता में भारी कटौती की वजह से जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था और रोजगार पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं, जिसका खामियाजा अब वहां के मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।

अन्य खबरें