देहरादून। एक तरफ उत्तराखंड के पहाड़ और जंगल भीषण गर्मी के बीच आग की लपटों से धधक रहे हैं, जिससे राज्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, इस संकट से निपटने के बजाय वन विभाग के अमले को जनगणना जैसे गैर-वन कार्यों की ड्यूटी में झोंक दिया गया है। इस बेहद गंभीर और विरोधाभासी मसले पर अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की प्रधान पीठ ने कड़ा और तीखा रुख अपनाया है। एनजीटी ने उत्तराखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (HoFF) को सीधे तौर पर जवाब तलब करते हुए पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वन अधिकारियों को गैर-वन गतिविधियों में क्यों लगाया गया?
सुनवाई की अहम तारीखें
ट्रिब्यूनल ने 'दीपिका खारी बनाम पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय एवं अन्य' से जुड़े मामले में संज्ञान लेते हुए दो स्तरों पर सुनवाई तय की है:
26 मई: वन अधिकारियों की इस विवादित तैनाती संबंधी मुद्दे पर अगली सुनवाई होगी।
8 जुलाई: मामले के अन्य महत्वपूर्ण पर्यावरणीय पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
अंतिम निर्देश: एनजीटी ने साफ किया है कि सभी संबंधित विभाग अगली सुनवाई से कम से कम तीन दिन पहले अपना विस्तृत जवाब हर हाल में दाखिल करें।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की सरेआम धज्जियां
यह पूरा मामला ऋषिकेश-देहरादून मार्ग स्थित बड़कोट वन रेंज में सूखी पत्तियां जलाने से हुए नुकसान को लेकर शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे वन विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक चूक तक पहुंच गया।
शिकायतकर्ता के अधिवक्ता गौरव बंसल ने एनजीटी की पीठ के सामने कुछ अहम तथ्य रखे:
राज्य सरकार का आदेश: उत्तराखंड सरकार ने गत 25 मार्च को एक आदेश जारी कर वन अधिकारियों को जनगणना कार्य में तैनात कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: यह तैनाती सुप्रीम कोर्ट के 15 मई 2024 के उस ऐतिहासिक आदेश का सीधा उल्लंघन है, जिसमें शीर्ष अदालत ने साफ कहा था कि वन कर्मियों और वन विभाग के वाहनों का उपयोग चुनाव, चारधाम यात्रा या किसी भी गैर-वन गतिविधि में कतई नहीं किया जाना चाहिए। अदालत का मानना था कि इससे वनों की सुरक्षा और वनाग्नि (जंगल की आग) नियंत्रण का काम बुरी तरह प्रभावित होता है।
एनजीटी की हाई-लेवल पीठ ने लिया संज्ञान
न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी, विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने देहरादून स्थित पीसीसीएफ (HoFF) को नोटिस जारी कर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है। विभाग को अब कोर्ट में यह साबित करना होगा कि जंगलों में आग लगने के सबसे संवेदनशील सीजन में ऐसी चूक क्यों और किसके इशारे पर की गई।
उत्तराखंड के अस्तित्व से जुड़ा बड़ा सवाल
संपादकीय टिप्पणी: उत्तराखंड के लिए गर्मियों का मौसम हमेशा वनाग्नि के लिहाज से बेहद संवेदनशील होता है। हर साल हजारों हेक्टेयर बेशकीमती वन संपदा राख हो जाती है, बेजुबान वन्यजीव असमय मौत के गाल में समा जाते हैं और पहाड़ों का नाजुक पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसे में जब आग बुझाने और निगरानी करने वाले मैदानी अमले को ही कागजी कार्य और फील्ड सर्वे (जनगणना) में लगा दिया जाएगा, तो सुलगते पहाड़ों को भगवान भरोसे छोड़ने के लिए जिम्मेदार कौन होगा? एनजीटी की इस सख्ती ने अब राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है।