खरीफ 2026 पर तिहरा संकट: अल नीनो, महंगे फर्टिलाइजर और कमजोर मिट्टी से निपटने के लिए 'बायोलॉजिकल' समाधान ही एकमात्र रास्ता

मौसम का मिजाज और भू-राजनीतिक उथल-पुथल बिगाड़ सकती है खरीफ फसलों का गणित; नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) और जैविक हस्तक्षेप से बचेगा किसानों का मुनाफा!

22 May 2026  |  57

 

नई दिल्ली: भारतीय कृषि के लिए आगामी खरीफ 2026 का सीजन एक बेहद चुनौतीपूर्ण परीक्षा लेकर आ रहा है। इस बार देश के कृषि क्षेत्र को तीन बड़ी ढांचागत चुनौतियों का एक साथ सामना करना पड़ रहा है: पहला- अल नीनो (El Niño) का बढ़ता खतरा, दूसरा- भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक फर्टिलाइजर (खाद) सप्लाई चेन में आई रुकावट, और तीसरा- दशकों से रसायनों के अत्यधिक उपयोग के कारण कमजोर हो चुकी मिट्टी।

कृषि व्यवसाय (Agribusiness) से जुड़े दिग्गजों और किसानों के लिए यह केवल मौसम का पूर्वानुमान भर नहीं है, बल्कि एक बड़ा 'सप्लाई-साइड रिस्क' है, जो कपास, सोयाबीन, मूंगफली, धान और गन्ने जैसी सबसे ज्यादा राजस्व देने वाली खरीफ फसलों की पैदावार और मुनाफे को सीधे प्रभावित कर सकता है।

1. अल नीनो और थर्मल स्ट्रेस का खतरा

NOAA के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के अनुसार, मई-जुलाई 2026 के दौरान अल नीनो उभरने की संभावना 61–62% है, जो नवंबर-जनवरी 2026/27 तक 72–80% की प्रबल संभावना के साथ बरकरार रह सकता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) और स्काईमेट के अनुमान भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि जून-जुलाई में मानसून की शुरुआत तो ठीक होगी, लेकिन अगस्त-सितंबर में बारिश बेहद असमान और कम हो सकती है।

यही वह समय होता है जब फसलें अपने 'रिप्रोडक्टिव फेज' (फूल और फल आने की अवस्था) में होती हैं। इसके अलावा, खरीफ के अंतिम महीनों में हीट वेव (भीषण गर्मी) और 'थर्मल स्ट्रेस' की बारंबारता बढ़ने का अनुमान है, जो फसलों की पैदावार को 15 से 25 फीसदी तक कम कर सकती है।

2. मिट्टी की सेहत: बैलेंस शीट पर सीधा असर

भारत के वर्षा-आधारित खरीफ क्षेत्रों में 60% से अधिक हिस्सा 'ग्रीन वॉटर' (मिट्टी में जमा नमी) पर निर्भर करता है। सघन रासायनिक खेती के कारण देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों की मिट्टी की जल-धारण क्षमता (Water Holding Capacity - WHC) सामान्य से 15–25% तक घट गई है।

बायोलॉजिकल समाधान: इस क्षमता को तुरंत बहाल करने के लिए 'जायटोनिक' (Zytonic) जैसी बायोडिग्रेडेबल पॉलीमर-आधारित जैविक तकनीकें बेहद कारगर साबित हो रही हैं। ये मिट्टी के छिद्रों को खोलकर उसकी जल-धारण क्षमता को सुधारती हैं और जड़ तंत्र को गहरा और घना बनाती हैं। इससे फसलें अगस्त-सितंबर के सूखे स्पेल (10-15 दिनों के शुष्क मौसम) को भी आसानी से बर्दाश्त कर लेती हैं।

3. फर्टिलाइजर सप्लाई चेन की दोहरी मुसीबत

फरवरी 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में हुए व्यवधान ने भारत के सामने फर्टिलाइजर का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है:

सब्सिडी वाले इनपुट (यूरिया): भारत के पास इस सीजन के लिए करीब 5.5 मिलियन टन यूरिया का ओपनिंग स्टॉक है, जबकि जरूरत 18-19.4 मिलियन टन की है। होर्मुज संकट के कारण आयात और एलएनजी फीडस्टॉक की आपूर्ति 50% से ज्यादा प्रभावित हुई है, जिससे मार्च 2026 में घरेलू उत्पादन में 30% की गिरावट आई। सरकार ने ₹2 लाख करोड़ से अधिक का सब्सिडी बोझ खुद उठाकर खुदरा कीमतें तो नहीं बढ़ने दीं, लेकिन जिला स्तर पर यूरिया की समय पर उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

गैर-सब्सिडी वाले इनपुट (DAP व अन्य): डीएपी (DAP) की कीमतें $625 से बढ़कर $865 प्रति टन तक पहुंच चुकी हैं। अमोनिया और सल्फर $900 प्रति टन को पार कर गए हैं। वॉटर-सॉल्युबल NPK और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कीमतों में 20–30% की बढ़ोतरी हुई है, जिसका सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ रहा है।

NUE: लागत कम करने का आर्थिक लीवर

भारत में वर्तमान में नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (Nitrogen Use Efficiency - NUE) केवल 35% है (जबकि हरित क्रांति के समय यह 48% थी)। इसका मतलब है कि इस्तेमाल की जाने वाली 65% यूरिया हवा में उड़ जाती है या मिट्टी में बहकर नष्ट हो जाती है।

उपाय: कैरियर प्लेटफॉर्म के माध्यम से नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया, फॉस्फेट और जिंक मोबिलाइजर्स जैसे जैविक तत्वों का उपयोग करके सिंथेटिक (रासायनिक) खादों पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। इसके अलावा, यूरिया पर पॉलीमर-आधारित स्लो-रिलीज कोटिंग एक उभरती हुई तकनीक है जो यूरिया के नुकसान को रोकती है।

फसल सुरक्षा और कीट प्रबंधन

गर्मी और नमी की कमी से जूझ रही फसलों पर रसचूसक कीटों (Sucking Pests) और इल्लियों (Caterpillars) का हमला अल नीनो के वर्षों में बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। इसके समाधान के लिए किसानों को सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे:

जायटोनिक सुरक्षा (Zytonic Suraksha): यह वातावरण की नमी (ओस) को अवशोषित कर पत्तों पर एक माइक्रो-फिल्म बनाती है, जो फसल के तापमान को नियंत्रित रखती है और फूल-फल को झड़ने (Abscission) से बचाती है।

बायो-पेस्टिसाइड फोलियर किट: बुवाई के 40–50 दिनों के बाद (DAS) बैसिलस सबटिलिस, ब्यूवेरिया बैसियाना, और वर्टिसिलियम लेकानी के साथ नीम-आधारित जैविक कीटनाशकों का छिड़काव फसलों को कीटों से सुरक्षित रखता है।

सफलता के लिए 4-चरणीय कार्ययोजना (Deployment Framework)

स्टेज 1 - बुवाई से पहले (Pre-sowing): मिट्टी की जल-धारण क्षमता और जैविक वास्तुकला को मजबूत करने के लिए 'जायटोनिक मिनी किट' (M + NPK + Zinc) का उपयोग करें। जहां डीएपी की कमी हो, वहां Zytonic PROM+ का उपयोग कर डीएपी की आवश्यकता को 50% तक कम करें। जड़ क्षेत्र की सुरक्षा के लिए 'सॉइल किट' (ट्राइकोडर्मा, मेटाराइजियम) अपनाएं।

स्टेज 2 - फर्टिलाइजर NUE प्रोग्राम: पोटाश मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया (Zytonic K) का उपयोग करें ताकि रासायनिक एमओपी (MOP) की जगह मिट्टी से जैविक रूप से निरंतर पोटाश मिलता रहे। खाद की टॉप-ड्रेसिंग निश्चित कैलेंडर तारीखों के बजाय मौसम के पूर्वानुमान को देखकर करें।

स्टेज 3 - तनाव और कीट प्रबंधन (खड़ी फसल): किसी भी 7-10 दिनों के सूखे स्पेल या अत्यधिक गर्मी की स्थिति में 'जायटोनिक सुरक्षा + जायटोनिक नीम' का मिश्रण स्प्रे करें। यह प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) को सुचारू रखेगा और कीटों के प्रसार को रोकेगा।

स्टेज 4 - मध्य-सीजन सुरक्षा (40–50 DAS): फसलों के सबसे संवेदनशील रिप्रोडक्टिव स्टेज पर इल्लियों और फंगल जनित रोगों के निवारक प्रबंधन के लिए 'बायो-पेस्टिसाइड फोलियर किट' का प्रयोग करें।

निष्कर्ष: खरीफ 2026 का सीजन उन किसानों और कृषि संगठनों का होगा जो पारंपरिक रासायनिक तौर-तरीकों से आगे बढ़कर शुरुआती चरण से ही मिट्टी में जैविक निवेश (Biological Investment) करेंगे और फसलों को मौसम के थपेड़ों से बचाने के लिए 'प्रिसिजन स्ट्रेस-मैनेजमेंट प्रोटोकॉल' को अपनाएंगे। विज्ञान प्रमाणित है, अब इसे खेतों में उतारने का समय है।

अन्य खबरें