H-1B धारकों को झटका: अमेरिका में ग्रीन कार्ड पाना हुआ और मुश्किल, USCIS ने बदला 'स्टेटस बदलाव' का नियम

नए पॉलिसी मेमो से भारतीय प्रोफेशनल्स और छात्रों की बढ़ी टेंशन; सिर्फ वैध स्टेटस होना काफी नहीं, अब अधिकारियों के 'विवेक' और 'सकारात्मक खूबियों' पर टिकेगा फैसला।

23 May 2026  |  66

 

वॉशिंगटन: अमेरिका में रहकर ग्रीन कार्ड (स्थायी निवास) का सपना देख रहे लाखों विदेशी नागरिकों, विशेषकर भारतीय H-1B वीजा धारकों और F-1 छात्रों को अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (USCIS) ने एक बड़ा झटका दिया है। USCIS ने शुक्रवार को एक नया पॉलिसी मेमो जारी किया है, जिसके तहत अमेरिका में रहकर 'स्टेटस में बदलाव' (Adjustment of Status) कराने की प्रक्रिया को बेहद कड़ा कर दिया गया है।

अब विदेशी नागरिकों को मौजूदा इमिग्रेशन कानूनों के तहत विदेश विभाग के जरिए अमेरिका के बाहर, अपने गृह देश की कांसुलर प्रोसेसिंग के माध्यम से ही यह प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय आवेदकों को अब अमेरिका छोड़कर भारत वापस आना होगा और यहीं से ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करना होगा।

क्यों उठाया गया यह सख्त कदम?

USCIS के प्रवक्ता ज़ैक काहलर ने इस नए नीतिगत बदलाव की वजह साफ करते हुए कहा:

कानून का मूल मकसद: "हम कानून के मूल मकसद की ओर लौट रहे हैं ताकि विदेशी नागरिक इमिग्रेशन सिस्टम का सही तरीके से पालन करें। कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, अब अस्थायी रूप से अमेरिका में मौजूद किसी भी नागरिक को ग्रीन कार्ड के लिए अपने देश वापस जाना ही होगा।"

कमियों का फायदा रोकने की कोशिश: यह नीति कानूनों की कमियों का फायदा उठाने की प्रवृत्ति को रोकेगी। जब लोग अपने देश से आवेदन करेंगे, तो अमेरिका में छिपकर अवैध रूप से रहने वाले लोगों की तलाश करने और उन्हें बाहर निकालने की जरूरत काफी कम हो जाएगी।

भारतीय H-1B प्रोफेशनल्स पर क्या होगा असर?

अब तक पारंपरिक तौर पर H-1B वर्कर्स यह मानकर चलते थे कि यदि वे अपना कानूनी स्टेटस बनाए रखते हैं, समय पर टैक्स चुकाते हैं और सभी शर्तें पूरी करते हैं, तो उनका I-485 (स्टेटस बदलाव) आवेदन आसानी से मंजूर हो जाएगा। लेकिन नए मेमो ने इस राह को पेचीदा बना दिया है:

फ़ुटनोट का बड़ा झटका: मेमो के एक महत्वपूर्ण फ़ुटनोट में साफ कहा गया है कि ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के दौरान सिर्फ वैध H-1B या L-1 स्टेटस बनाए रखना ही, अपने आप में फैसले को पक्ष में कराने के लिए काफी नहीं होगा।

इमिग्रेशन वकील निकोल गुरनारा के मुताबिक, "यह मेमो अधिकारियों के रवैये को बदलता है। अमेरिका में रहकर ग्रीन कार्ड आवेदन की मंजूरी हमेशा से अधिकारियों के विवेक (Discretion) पर निर्भर थी, लेकिन पहले इसका कड़ाई से इस्तेमाल नहीं होता था। अब अधिकारियों के विवेक के आधार पर आवेदनों की अस्वीकृति (Rejection) बढ़ने की पूरी आशंका है।"

F-1 छात्रों के लिए खड़ी होगी सबसे बड़ी दीवार

विशेषज्ञों के अनुसार, H-1B धारकों के मुकाबले F-1 वीजा वाले छात्रों को कहीं अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि F-1 'दोहरे इरादे' (Dual Intent) वाला वीजा नहीं है। छात्र वीजा लेते समय आवेदकों ने कांसुलर अधिकारी को आश्वासन दिया था कि वे पढ़ाई पूरी कर भारत लौट जाएंगे। अब ग्रीन कार्ड का आवेदन उनके उस पुराने बयान के विपरीत माना जा सकता है और अधिकारी इस पर कड़ी आपत्ति जता सकते हैं।

लंबा इंतजार करने वाले भारतीय परिवारों के लिए 'सिल्वर लाइनिंग'

इस कड़े मेमो में उन भारतीय परिवारों के लिए एक राहत की बात भी है जो EB-2 या EB-3 कैटेगरी में पिछले 10 से 15 साल से ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं:

केस को मजबूत बनाने का मौका: नए नियम के तहत अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे हर मामले में सभी जरूरी जानकारियों पर अलग-अलग विचार करें।

सकारात्मक पहलू आएंगे काम: आवेदकों को ग्रीन कार्ड पाने के लिए अब खुद को सिर्फ 'योग्य' साबित करने से ज्यादा कुछ करना होगा। उन्हें अमेरिका में बिताए समय के दौरान बनाए गए सकारात्मक रिश्ते, पारिवारिक जुड़ाव, बेदाग टैक्स इतिहास, सामाजिक भागीदारी और करियर की तरक्की जैसी निजी खूबियों का विस्तृत ब्यौरा देना होगा, जो उनके पक्ष में एक मजबूत आधार तैयार कर सके।

निष्कर्ष: अमेरिका में रहकर आवेदन करने का जो रास्ता पहले सबसे आसान और पसंदीदा हुआ करता था, वह अब अधिकारियों के विवेक और कड़े मूल्यांकन के कारण एक बेहद कठिन और जोखिम भरा सफर बन गया है।

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