बदल रहा है भारत का जनसांख्यिकीय ताना-बाना: प्रजनन दर में ऐतिहासिक गिरावट, पर क्या हम 'अमृत काल' के अवसर को भुनाने के लिए तैयार हैं?

2.1 से गिरकर 1.9 पर पहुँची देश की टीएफआर (TFR); बूढ़े होते राज्यों के बीच कामकाजी आबादी दे रही है आर्थिक उछाल की नई उम्मीद।

24 May 2026  |  107

 

नई दिल्ली: भारत की जनसंख्या संरचना में एक बड़ा और दूरगामी बदलाव देखने को मिल रहा है। साल 2024 की नवीनतम सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल प्रजनन दर (TFR) अब 'रिप्लेसमेंट लेवल' (2.1) से नीचे गिरकर 1.9 पर आ गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार अब धीमी हो रही है, जिससे भविष्य में आबादी के घटने का खतरा भी मंडराने लगा है।

'रिप्लेसमेंट लेवल' से नीचे की दुनिया: दिल्ली सबसे आगे, बिहार अब भी पीछे

जब टीएफआर 2.1 होता है, तो आबादी स्थिर रहती है क्योंकि एक महिला औसतन अपने और अपने जीवनसाथी की जगह (रिप्लेसमेंट) ले लेती है। लेकिन अब देश के अधिकांश हिस्सों में यह संतुलन बदल रहा है:

सबसे कम प्रजनन दर: देश की राजधानी दिल्ली (1.2) में प्रजनन दर सबसे कम दर्ज की गई है। इसके ठीक बाद केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल (1.3) का नंबर आता है।

अपवाद वाले राज्य: बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में टीएफआर 'रिप्लेसमेंट लेवल' से नीचे चला गया है।

धीमी रफ्तार: पिछले एक दशक में बिहार में टीएफआर में सबसे कम (महज 9.4%) की गिरावट आई है, जो 2012-14 के 3.2 से घटकर अब 2.9 पर आया है। वहीं दिल्ली (29.4%) और तमिलनाडु (23.5%) में यह गिरावट बेहद तीव्र रही है।

बच्चों की संख्या घटी, बुजुर्गों की आबादी में उछाल

प्रजनन दर में आई इस कमी का सीधा असर देश की उम्र-वार आबादी पर दिख रहा है। जिन राज्यों में टीएफआर एक दशक पहले ही गिर गया था, वहाँ बच्चों (0-14 वर्ष) की संख्या काफी कम हो चुकी है।

एक नज़र आँकड़ों पर:

राज्य / भारतबच्चों की आबादी (0-14 वर्ष)बुजुर्गों की आबादी (60+ वर्ष)
भारत (औसत)24%9.7% (2014 में 8.6% था)
बिहार31.5%
तमिलनाडु18%14.2% (तेजी से बूढ़ा होता राज्य)
केरल15% (देश में सबसे बुजुर्ग राज्य)
असम7.6% (बुजुर्गों का सबसे कम अनुपात)

 

'डेमोग्राफिक विंडो': अभी बंद नहीं हुआ है सुनहरे अवसरों का दरवाजा

इस रिपोर्ट का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि प्रजनन दर में गिरावट के बावजूद भारत की कामकाजी उम्र वाली आबादी (15-59 वर्ष) लगातार बढ़ रही है। इसका मतलब है कि देश के लिए 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) का अवसर अभी भी खुला हुआ है।

"भारत की कुल आबादी में कामकाजी उम्र के लोगों का हिस्सा अब 66.4% हो गया है, जो 2014 में 64% था। इसके विपरीत, आश्रित बच्चों की आबादी 24% और बुजुर्गों की आबादी 10% से कम है।"

चेतावनी की घंटी: सीमित है यह समय!

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनहरा अवसर हमेशा नहीं रहेगा क्योंकि कामकाजी आबादी अब अपने चरम (Peak) पर पहुँच रही है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में कामकाजी आबादी का अनुपात पिछले दशक में महज 0.6% (67.2% से बढ़कर 67.8%) ही बढ़ा है।

निष्कर्ष: भारत इस समय एक ऐसे अनूठे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक तरफ देश तेजी से बूढ़ा होने की ओर अग्रसर है, तो दूसरी तरफ युवाओं की फौज आर्थिक क्रांति लाने के लिए तैयार है। नीति निर्माताओं के लिए चुनौती इस सीमित समय का सही उपयोग करने की होगी।

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